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आलस्यं परमं सुखम्।

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(एक व्यंग्य)  हाँ, माना कि पूर्वज कह कर गए हैं—  “ अलसस्य  कुतो विद्या।” लेकिन ज़रा यह भी तो देखिए कि यह कहावत किस समय की है। तब न बिजली थी, न इंटरनेट। विद्या पाने के लिए पहाड़ चढ़ने पड़ते थे, नदियाँ तैरनी पड़ती थीं और दूर-दराज़ के गुरुकुलों तक पैदल जाना पड़ता था। ठंड, भूख और असंख्य कष्टों को सहकर ही कहीं जाकर ज्ञान प्राप्त होता था। आज स्थिति बिल्कुल उलट है। अब विद्या पाने के लिए नदी पार नहीं करनी पड़ती—बस मोबाइल या लैपटॉप का बटन दबाइए और जो जानना है, सामने हाज़िर। आज विद्या साधना नहीं,  ‘नेटवर्क’  माँगती है। ऐसे समय में आलस्य को निकम्मेपन से जोड़ देना सबसे बड़ी बौद्धिक भूल है। आलस्य आज के ज़माने का एक गुण है, जिसे काम-धाम के भूखे लोगों ने बदनाम कर रखा है। देखिए, भारतीय सभ्यता हज़ारों सालों से इसलिए टिकी हुई है क्योंकि हमने समय के साथ ख़ुद को बदला है; लेकिन विडंबना यह है कि आलस्य का मापदंड भारतीय परिवारों में आज के डिजिटल युग में भी वही है, जो बीसवीं शताब्दी के औद्योगिक युग में था। सुबह देर से उठना हमारे यहाँ आलस्य का पहला प्रमाण माना जाता है। दोपहर में थोड़ी दे...