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जेन- ज़ी रिसर्च बनाम जेन- एक्स रूटीन

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अभी - अभी   योगा   करके ,  योगा   मैट   को   सलीके   से   समेटकर ,  तुलसी   वाली   ब्लैक   टी   लेकर   सोफ़े   पर   बैठा   ही   था। शरीर   हल्का   था ,  मन   शांत।   सोचा — चलो ,  दो   मिनट   सुस्ताते   हुए   व्हाट्सऐप   ही   देख   लिया   जाए। तभी   स्कूल   के   ग्रुप   में   एक   फ़ॉरवर्ड   मैसेज   टपक   पड़ा — “ सावधान !   नई   रिसर्च   का   दावा : अख़बार   पर   खाना  हो  सकता   है  जानलेवा  !” यह   मैसेज   भेजा   भी   तो   उस   मित्र   ने ,  जो   कभी   क्लास   की   पिछली   बेंच   का   ‘ स्थायी   मौन   सदस्य ’   हुआ   करता   था। मौन   रहना   उसका   स्वभाव   नहीं ,  बल्कि   मजबूरी   थी ,...

आलस्यं परमं सुखम्।

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(एक व्यंग्य)  हाँ, माना कि पूर्वज कह कर गए हैं—  “ अलसस्य  कुतो विद्या।” लेकिन ज़रा यह भी तो देखिए कि यह कहावत किस समय की है। तब न बिजली थी, न इंटरनेट। विद्या पाने के लिए पहाड़ चढ़ने पड़ते थे, नदियाँ तैरनी पड़ती थीं और दूर-दराज़ के गुरुकुलों तक पैदल जाना पड़ता था। ठंड, भूख और असंख्य कष्टों को सहकर ही कहीं जाकर ज्ञान प्राप्त होता था। आज स्थिति बिल्कुल उलट है। अब विद्या पाने के लिए नदी पार नहीं करनी पड़ती—बस मोबाइल या लैपटॉप का बटन दबाइए और जो जानना है, सामने हाज़िर। आज विद्या साधना नहीं,  ‘नेटवर्क’  माँगती है। ऐसे समय में आलस्य को निकम्मेपन से जोड़ देना सबसे बड़ी बौद्धिक भूल है। आलस्य आज के ज़माने का एक गुण है, जिसे काम-धाम के भूखे लोगों ने बदनाम कर रखा है। देखिए, भारतीय सभ्यता हज़ारों सालों से इसलिए टिकी हुई है क्योंकि हमने समय के साथ ख़ुद को बदला है; लेकिन विडंबना यह है कि आलस्य का मापदंड भारतीय परिवारों में आज के डिजिटल युग में भी वही है, जो बीसवीं शताब्दी के औद्योगिक युग में था। सुबह देर से उठना हमारे यहाँ आलस्य का पहला प्रमाण माना जाता है। दोपहर में थोड़ी दे...

मन पर बैठा मैनाक

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अस्सी के दशक का वह आख़िरी दौर, जब क्रिकेट मैच का समय जैसे ही आता, लोग दूरदर्शन से चिपक जाते थे। जिन घरों में टीवी नहीं होता था, वहाँ लोग रेडियो सुनने लगते, और जहाँ रेडियो नहीं होता था, वहां ट्रांजिस्टर, और जहाँ ट्रांजिस्टर भी नहीं होता था, वहाँ चाय–पान की दुकानों पर बजती कमेंट्री ही सबका सहारा बनती। देश में हर कोई क्रिकेट विशेषज्ञ बन चुका था। मैच देखते हुए कोई कहता — “अज़हरुद्दीन ने कलाई ज़्यादा मोड़ ली।” कोई तर्क देता — “कपिल देव को इनस्विंग डालनी चाहिए।” तो कोई कर्नल को सलाह देता — “इस गेंद पर स्वीप मारने की ज़रूरत नहीं थी, बैकफुट पर जाकर कट करना चाहिए था।” अटक से लेकर कटक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक — क्रिकेट हर दिल की धड़कन बन चुका था। यह केवल खेल नहीं था; यह धर्म था, त्योहार था और उत्सव का बहाना भी। चाहे महानगरों की चौड़ी सड़कें हों या कस्बों की गलियाँ, गाँव की चौपालें हों या खेत–खलिहान — हर जगह बस क्रिकेट ही गूँज रहा था। किसानों का देश भारत अब गर्व से क्रिकेट का देश कहलाने लगा था। जिस तरह देशभर में क्रिकेट दीवानगी बन गया था, उसी तरह उज्जैन भी उससे अछूता नहीं रहा। देश के हर छ...