जेन- ज़ी रिसर्च बनाम जेन- एक्स रूटीन
अभी-अभी योगा करके, योगा मैट को सलीके से समेटकर, तुलसी वाली ब्लैक टी लेकर सोफ़े पर बैठा ही था।
शरीर हल्का था, मन शांत। सोचा—चलो, दो मिनट सुस्ताते हुए व्हाट्सऐप ही देख लिया जाए।
तभी स्कूल के ग्रुप में एक फ़ॉरवर्ड मैसेज टपक पड़ा—
“सावधान! नई रिसर्च का दावा:अख़बार पर खाना हो सकता है जानलेवा !”
यह मैसेज भेजा भी तो उस मित्र ने, जो कभी क्लास की पिछली बेंच का ‘स्थायी मौन सदस्य’ हुआ करता था।मौन रहना उसका स्वभाव नहीं, बल्कि मजबूरी थी, क्योंकि उसके मुँह में सादी पत्ती, सुपारी और पचास पैसे वाले ‘बादशाह’ गुटखे का ‘स्थायी अधिवेशन’ चलता रहता था।
मैसेज पूरा पढ़ते ही, कपालभाती किए बिना ही मेरी साँसें तेज़ चलने लगीं।
मन में सवाल उठा—भाई, आज की जेन-Z की जवानी में भला कितने लोग अख़बार पर कुछ खाते होंगे?
ये रिसर्च अगर हमारे—जेन-X या मिलेनियल्स—के अस्सी-नब्बे के दशक में हुई होती, तो आधा मालवा वैक्सीनेशन की लाइन में खड़ा दिखता।
हम अभी उम्र के उस पड़ाव में हैं, जहाँ जेन-Z हमें ओल्ड समझते हैं और बुजुर्ग कह देते हैं—“अरे, अभी तो बहुत कुछ देखना है।”
इस उम्र में असली डर बीमारी से ज़्यादा उसे गूगल करने में है।
सर में ज़रा-सा दर्द हो और सर्च करो—सामने आ जाता है: “ट्यूमर भी हो सकता है!”
दो सीढ़ियाँ चढ़कर साँस फूल जाए—इंटरनेट तुरंत बोलता है: “हार्ट की जाँच कराइए!”
काम में मन न लगे—“डिप्रेशन का शुरुआती लक्षण।”
ठंड में घुटने दुखें—“हड्डियाँ जवाब दे रही हैं।”
पहले घर के बुज़ुर्ग कहते थे—
“दो दिन आराम कर ले, ठीक हो जाएगा।”
आज गूगल कहता है—
“दो दिन में सब कुछ हो सकता है।”
अभी हम गूगल के डर से किसी तरह उबर ही रहे थे कि आप ये अख़बार पर खाने वाली रिसर्च ले आए। अब आदमी करे तो क्या करे—इलाज करवाए या डर से ही मर जाए?
आपको क्या मालूम है, साहब, हमारे समय के फूड इंडस्ट्री में अख़बार का कितना बड़ा योगदान था।
रद्दी वालों का पूरा फ़ोकस घर के अख़बार पर होता था—हिंदी वाला डेढ़ रुपये किलो, अंग्रेज़ी वाला दो रुपये। वही अख़बार आगे चलकर सीधे होटलों में सप्लाई होता।
होटलों की टेबल पर ताज़ा अख़बार पढ़ने के लिए रखा जाता, और अगले दिन बासी होकर चुपचाप प्लेट बनकर अपनी दूसरी पारी निभा देता। तब इसी को रीसायकल बोलते थे |
हर होटल, उपहारगृह और रेस्टोरेंट में अख़बार काटने के लिए एक प्रशिक्षित आदमी हुआ करता था।
सूर्योदय की पहली किरण के साथ ही उसके हाथ आलू छीलने लगते।
जब लोग सुबह की सैर पर निकलते,तब तक वह प्याज़ और मिर्च काटकर ढेर कर चुका होता।
जैसे ही बच्चे ऑटो, टेम्पो और साइकिलों पर सवार होकर स्कूल के लिए निकलते,
वह अनुभवी व्यक्ति इंदौर-मेड ‘रूपाली’ या ‘डॉलरिया’ या 'लुक्सी ' की सैंडो बनियान पहने खौलते समोसों की कड़ाही के पास पद्मासन जमाकर बैठ जाता। हाथ में उसका छोटा आरी-नुमा चाकू होता और सामने अख़बारों का ढेर—अब बारी होती थी दिन भर की प्लेटें बनाने की। वह उन्हें ऐसे सहेज-सहेजकर,नाप-तौलकर काटता,मानो आज मनीष मल्होत्रा किसी सेलेब के लिए ड्रेस कटवा रहा हो।
समोसे-कचौरी के लिए एक साइज़,
पोहे के लिए थोड़ा बड़ा,
और जलेबी के लिए मोटा, डबल साइज़।
उज्जैन के फ़्रीगंज की होटल हो या शाजापुर के बस-स्टैंड का उपहारगृह, रतलाम का रेस्टोरेंट हो या इंदौर के सराफा का स्नैक्स सेंटर—हर जगह यही रोज़गार दिख जाता था।
लोग उसी अख़बार पर खाने के लिए लाइन लगाते थे और वही अख़बार किसी का चूल्हा जलाता था।
जिन लोगों ने अपने परिवार का पेट पालने के लिए ज़िंदगी भर होटल के बाहर बैठकर अख़बार काटे,क्या कभी किसी रिसर्च करने वाले ने यह सोचा होगा कि ऐसी रिसर्च का उन पर क्या असर पड़ेगा?
भाईसाहब, मालवा में खाने के साथ सेव-नमकीन का शुरू से ही इतना क्रेज़ है कि, जब लड़का बाहर पढ़ने या नौकरी करने जाता, तो वह माँ-बाप और पत्नी से ज़्यादा सेव-नमकीन को याद करता।
“वो टेस्ट नी है भिया, यहाँ के सेव-नमकीन में”—यही बोल-बोलकर उसकी हालत ऐसी होती जैसे कण्व ऋषि के आश्रम में दुष्यंत की याद में तड़पती शकुंतला।
सोचो, इतना पॉपुलर आइटम ‘सेव’ भी अख़बार में तौलकर, ऊपर से डोरी लगाकर दिया जाता था और आप ले आए ये रिसर्च |
और कभी घर-परिवार में जब छोटे बच्चे का ज़िक्र होता और आप पूछो—
“जीतू भैया, कैसा है गप्पू? कित्ते साल का हो गया?”
जीतू भैया प्यार से बताते—
“अब तो ढाई साल का हो गया।”
फिर अगला अपडेट आता—
“अरे बेटा, अब तो उसे लौंग के मोटे सेव या फीका गाठिया दे दो, अख़बार पर रखकर—दो मिनट में बैठे-बैठे साफ़ कर देता है।”
देख रहे हो आप? यही था उस ज़माने का ग्रोथ-चार्ट—
न कोई ऐप, न कैलोरी-काउंट, न ग्राफ़।
…क्या बताएं, हमारे बचपन के वे सुहाने दिन।
एम.पी. रोडवेज़ की बस की खड़खड़ाती खिड़की से किलोमीटर के पत्थर देख-देखकर हम बस यही इंतज़ार करते रहते थे कि कब अगला बस-स्टैंड आए और कब अख़बार पर रखे, भाप उगलते गरम-गरम समोसे नसीब हों।
हमारे काकाओं ने हमें ज़िंदगी की पहली व्यवहारिक शिक्षा दी थी—
“बेटा, पहले समोसे को अख़बार के काग़ज़ से चिबद (दबा) दे, फिर खा।”
ये थे पारिवारिक संस्कार, और आज की ये रिसर्च उन्हीं संस्कारों पर उँगली उठा रही है।
और तो और, जब कभी बुआ या चाची के साथ सफ़र होता और उनका व्रत रहता, तो पैसे पकड़ा देतीं—
“बस रुके तो मूँगफली ले आ।”
बस के रुकते ही हम दौड़ लगाते और ठेले वाले से अख़बार के कोन में गरम-गरम मूँगफली के दाने भरवाकर ला देते, जैसे कोई भारी पुण्य का काम किया हो।
और आज आप अचानक ये जानकारी लाकर हमें अपराधबोध से भर रहे हैं—जैसे हमने कोई पाप कर दिया हो।
और सुनो, भाईसाहब—
उस टाइम पर हमारे कितने ही रिश्तेदार एम.पी. रोडवेज़ में थे।इन सरकारी बसों वाली नौकरी में उनकी ज़िंदगी का शायद ही कोई दिन गुज़रा हो, जब अख़बार पर पोहे, समोसे, कचौरी या जलेबी न खाई हो।
तब आप ए.बी. रोड के ग्वालियर से लेकर इंदौर तक के शहरों के बस-स्टैंड के होटलों की “रेटिंग” पूछ लो—तो तुरंत ज्ञान दे देते थे—
“भैया, टाइम देख लेना…
सुबह छह बजे वाली उज्जैन–दिल्ली से निकल रहे हो तो शाजापुर में,
और सात बजे उज्जैन–ग्वालियर से जा रहे हो तो सारंगपुर में—
वहाँ गरम समोसे मिलेंगे, ऐसे कि चाय बाद में याद आएगी।”
सवारी के साथ कंडक्टर, ड्राइवर, क्लीनर—सब मिल-जुलकर खाते थे अख़बार के ऊपर रखे समोसे-कचौरी-पोहे।
तब न किसी को स्याही की चिंता थी, न गंभीर बीमारी की संभावना, न गूगल की सलाह—
बस चाय गरम होनी चाहिए और समोसा भाप उगलता।
और आपको बताएं तो आश्चर्य करोगे—वही हमारे बुज़ुर्ग परिजन आज रिटायर होकर रोज़ सुबह दस हज़ार स्टेप्स चलते हैं।
अब ट्रेन के सफ़र की बात करें।
जब परिवार के साथ उज्जैन–भोपाल का ट्रेन-सफ़र होता, तो घर से निकलते वक़्त पूरी-आलू की सब्ज़ी स्टील के डब्बे में रख ली जाती थी।
बेरछा आते-आते वो डब्बे खुल जाते; अगर काग़ज़ की प्लेटें न हों तो बाजू में बैठे किसी अजनबी से सहज ही पूछ लिया जाता—“भाई साहब, अख़बार पढ़ लिया क्या?”
वे मुस्कराकर कह देते—
“हाँ जी, ले लीजिए… मेरा हो गया।”
उसी अख़बार को फाड़-फाड़कर सबको पूरी-आलू दी जाती और पूरा ट्रेन का डिब्बा आलू की सब्ज़ी की खुशबू से भर जाता।
फिर उन्हीं अख़बार वाले भाई साहब से पूछा जाता—
“आप भी खा लीजिए हमारे साथ।”
वे हाथ जोड़कर कहते—“नहीं-नहीं, आज मेरा ग्यारस का व्रत है। नहीं तो बिल्कुल खाता- अपने घर की ही बात है |”
यही थी आत्मीयता।
किसी को डर नहीं लगता था कि सामने वाला कुछ मिला देगा या धोखा कर देगा।
आज अगर ट्रेन में कोई खाने को बढ़ा दे, तो मन सबसे पहले पूछता है—
“कहीं इसमें कुछ नशीला तो नहीं?”
आज विश्वास इतना टूट चुका है कि कोई गलती से खाने को पूछ ले, तो पूरा सफ़र उसे शक़ की नज़रों से देखा जाता है।
सच ही तो लिख गए हमारे बड़नगर के कवि प्रदीप जी—
“देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई, भगवान… कितना बदल गया इंसान!”
चलिए, अब घर पर आते हैं।
तब के पारिवारिक माहौल को लीजिए—घर में सेव-परमल का प्रोग्राम बनते ही तुरंत आवाज़ आती थी,
“जा बंटी, जा के अख़बार ले आ, सेव-परमल बिछाने के लिए।”
बंटी बड़े पुलकित मन से स्टोर-रूम से फ़िल्मी एडिशन वाला अख़बार निकाल लाता, और जूही चावला, माधुरी दीक्षित और श्रीदेवी कुछ ही पलों में सेव-परमल, नींबू, प्याज़ और धनिया के नीचे ग़ायब हो जातीं।
दस-बारह लोग एक साथ, मुट्ठी-भर-भरकर खाते दिख जाते—न कोई गिनती, न कोई शिष्टाचार, बस अपनापन।
वही अख़बार टेबल भी था, थाली भी,और बहाने से बातचीत शुरू कराने वाला मंच भी।
आज के ज़माने में बताइए, भैया—क्या कहीं बचा है इतना भाईचारा?
आज तो, साहब, व्हाट्सऐप पर एक साथ परिवार को बात करनी हो,तो उसका भी इवेंट रखा जाता है,
और आप हैं कि ये रिसर्च लाकर बता रहे हैं कि वह सब नहीं करना था।
हम कभी राजस्थान अपने रिश्तेदारों से मिलने जाते थे,
तो कज़िन हमें बाज़ार ले जाते—“चलो भैया,
प्याज़ की कचौरी खा के आते हैं।”
कचौरी का स्वाद तो अपनी जगह था, पर असली मज़ा उस राजस्थानी मनुहार में होता था—खिला कर मनवाने में।
“अरे भाईसाहब, आपको क़सम है… ये लो एक और ,” कहते हुए ज़बरदस्ती एक और कचौरी अख़बार के काग़ज़ पर रख दी जाती थी।
यही था अपनापन, यही था रिश्ता।
और अब आप ये ख़बर ले आए हैं कि वह सब ख़तरनाक था।
तो भैया, फिर सही क्या बचा?
क्या अब रिश्ते भी पैक होकर आएँगे—
हाइजीनिक, सीमित मात्रा में, और चेतावनी के साथ?
वापस उस ख़बर पर आते हैं, तो सबसे बड़ा सवाल अब भी वहीं खड़ा है—
आख़िर किस मीटिंग में यह तय हुआ होगा कि
“इलाज तो चलता रहेगा, पहले जनता को थोड़ा डराया जाए”?
क्योंकि डरा हुआ आदमी सबसे ज़्यादा आज्ञाकारी होता है—
वह सवाल नहीं पूछता, बस मैसेज फ़ॉरवर्ड करता है।
आज दुनिया अजीब तरह से दो हिस्सों में बँटी दिखती है—
एक तरफ़ वे लोग हैं जो दिन-रात बैठकर बीमारियों का इलाज खोज रहे हैं,
और दूसरी तरफ़ वे, जो हर रोज़ यह ढूँढ रहे हैं कि अगली बीमारी अब किस खाने के नीचे छिपकर बैठी है।
करो भैया, रिसर्च करो…
पर अगली बार ये मत ले आना कि बचपन में किसने स्लेट पर लिखने वाली पेम खाई थी और अब उन्हें ‘एंटी-पेम’ का वैक्सीन लगवाना पड़ेगा।
वो भी खाई है, भैया, हमारे ज़माने के भोले लोगों ने।
या फिर ये मत बताना कि जिन्होंने फ़ेविकोल को उँगलियों और हथेलियों पर चुपचाप सुखाकर उसकी परत उतारी थी, उन्हें अब स्किन-चेक करवानी पड़ेगी।
हमने तो ये सब ही किया है, साब—
चार दीवारों में स्क्रीन ताकते हुए नहीं,खुले मैदानों में साँसें भरते हुए,
स्कूल की घंटियों के बीच ज़िंदगी सीखते हुए,
साइकिल पर दोस्तों संग शहर भर की गलियाँ नापते ,और शाम ढलते मैदान में खेलते |
तब खुशी वाई-फाई से नहीं,
डाउनलोड से नहीं,
बस इन लम्हों में पूरी हो जाती थी।
- अख़बार पर समोसे खाने वाली पीढ़ी से
अभी-अभी योगा करके, योगा मैट को सलीके से समेटकर, तुलसी वाली ब्लैक टी लेकर सोफ़े पर बैठा ही था।
शरीर हल्का था, मन शांत। सोचा—चलो, दो मिनट सुस्ताते हुए व्हाट्सऐप ही देख लिया जाए।
तभी स्कूल के ग्रुप में एक फ़ॉरवर्ड मैसेज टपक पड़ा—
“सावधान! नई रिसर्च का दावा:अख़बार पर खाना हो सकता है जानलेवा !”
यह मैसेज भेजा भी तो उस मित्र ने, जो कभी क्लास की पिछली बेंच का ‘स्थायी मौन सदस्य’ हुआ करता था।मौन रहना उसका स्वभाव नहीं, बल्कि मजबूरी थी, क्योंकि उसके मुँह में सादी पत्ती, सुपारी और पचास पैसे वाले ‘बादशाह’ गुटखे का ‘स्थायी अधिवेशन’ चलता रहता था।
मैसेज पूरा पढ़ते ही, कपालभाती किए बिना ही मेरी साँसें तेज़ चलने लगीं।
मन में सवाल उठा—भाई, आज की जेन-Z की जवानी में भला कितने लोग अख़बार पर कुछ खाते होंगे?
ये रिसर्च अगर हमारे—जेन-X या मिलेनियल्स—के अस्सी-नब्बे के दशक में हुई होती, तो आधा मालवा वैक्सीनेशन की लाइन में खड़ा दिखता।
हम अभी उम्र के उस पड़ाव में हैं, जहाँ जेन-Z हमें ओल्ड समझते हैं और बुजुर्ग कह देते हैं—“अरे, अभी तो बहुत कुछ देखना है।”
इस उम्र में असली डर बीमारी से ज़्यादा उसे गूगल करने में है।
सर में ज़रा-सा दर्द हो और सर्च करो—सामने आ जाता है: “ट्यूमर भी हो सकता है!”
दो सीढ़ियाँ चढ़कर साँस फूल जाए—इंटरनेट तुरंत बोलता है: “हार्ट की जाँच कराइए!”
काम में मन न लगे—“डिप्रेशन का शुरुआती लक्षण।”
ठंड में घुटने दुखें—“हड्डियाँ जवाब दे रही हैं।”
पहले घर के बुज़ुर्ग कहते थे—
“दो दिन आराम कर ले, ठीक हो जाएगा।”
आज गूगल कहता है—
“दो दिन में सब कुछ हो सकता है।”
अभी हम गूगल के डर से किसी तरह उबर ही रहे थे कि आप ये अख़बार पर खाने वाली रिसर्च ले आए। अब आदमी करे तो क्या करे—इलाज करवाए या डर से ही मर जाए?
आपको क्या मालूम है, साहब, हमारे समय के फूड इंडस्ट्री में अख़बार का कितना बड़ा योगदान था।
रद्दी वालों का पूरा फ़ोकस घर के अख़बार पर होता था—हिंदी वाला डेढ़ रुपये किलो, अंग्रेज़ी वाला दो रुपये। वही अख़बार आगे चलकर सीधे होटलों में सप्लाई होता।
होटलों की टेबल पर ताज़ा अख़बार पढ़ने के लिए रखा जाता, और अगले दिन बासी होकर चुपचाप प्लेट बनकर अपनी दूसरी पारी निभा देता। तब इसी को रीसायकल बोलते थे |
हर होटल, उपहारगृह और रेस्टोरेंट में अख़बार काटने के लिए एक प्रशिक्षित आदमी हुआ करता था।
सूर्योदय की पहली किरण के साथ ही उसके हाथ आलू छीलने लगते।
जब लोग सुबह की सैर पर निकलते,तब तक वह प्याज़ और मिर्च काटकर ढेर कर चुका होता।
जैसे ही बच्चे ऑटो, टेम्पो और साइकिलों पर सवार होकर स्कूल के लिए निकलते,
वह अनुभवी व्यक्ति इंदौर-मेड ‘रूपाली’ या ‘डॉलरिया’ या 'लुक्सी ' की सैंडो बनियान पहने खौलते समोसों की कड़ाही के पास पद्मासन जमाकर बैठ जाता। हाथ में उसका छोटा आरी-नुमा चाकू होता और सामने अख़बारों का ढेर—अब बारी होती थी दिन भर की प्लेटें बनाने की। वह उन्हें ऐसे सहेज-सहेजकर,नाप-तौलकर काटता,मानो आज मनीष मल्होत्रा किसी सेलेब के लिए ड्रेस कटवा रहा हो।
समोसे-कचौरी के लिए एक साइज़,
पोहे के लिए थोड़ा बड़ा,
और जलेबी के लिए मोटा, डबल साइज़।
उज्जैन के फ़्रीगंज की होटल हो या शाजापुर के बस-स्टैंड का उपहारगृह, रतलाम का रेस्टोरेंट हो या इंदौर के सराफा का स्नैक्स सेंटर—हर जगह यही रोज़गार दिख जाता था।
लोग उसी अख़बार पर खाने के लिए लाइन लगाते थे और वही अख़बार किसी का चूल्हा जलाता था।
जिन लोगों ने अपने परिवार का पेट पालने के लिए ज़िंदगी भर होटल के बाहर बैठकर अख़बार काटे,क्या कभी किसी रिसर्च करने वाले ने यह सोचा होगा कि ऐसी रिसर्च का उन पर क्या असर पड़ेगा?
भाईसाहब, मालवा में खाने के साथ सेव-नमकीन का शुरू से ही इतना क्रेज़ है कि, जब लड़का बाहर पढ़ने या नौकरी करने जाता, तो वह माँ-बाप और पत्नी से ज़्यादा सेव-नमकीन को याद करता।
“वो टेस्ट नी है भिया, यहाँ के सेव-नमकीन में”—यही बोल-बोलकर उसकी हालत ऐसी होती जैसे कण्व ऋषि के आश्रम में दुष्यंत की याद में तड़पती शकुंतला।
सोचो, इतना पॉपुलर आइटम ‘सेव’ भी अख़बार में तौलकर, ऊपर से डोरी लगाकर दिया जाता था और आप ले आए ये रिसर्च |
और कभी घर-परिवार में जब छोटे बच्चे का ज़िक्र होता और आप पूछो—
“जीतू भैया, कैसा है गप्पू? कित्ते साल का हो गया?”
जीतू भैया प्यार से बताते—
“अब तो ढाई साल का हो गया।”
फिर अगला अपडेट आता—
“अरे बेटा, अब तो उसे लौंग के मोटे सेव या फीका गाठिया दे दो, अख़बार पर रखकर—दो मिनट में बैठे-बैठे साफ़ कर देता है।”
देख रहे हो आप? यही था उस ज़माने का ग्रोथ-चार्ट—
न कोई ऐप, न कैलोरी-काउंट, न ग्राफ़।
…क्या बताएं, हमारे बचपन के वे सुहाने दिन।
एम.पी. रोडवेज़ की बस की खड़खड़ाती खिड़की से किलोमीटर के पत्थर देख-देखकर हम बस यही इंतज़ार करते रहते थे कि कब अगला बस-स्टैंड आए और कब अख़बार पर रखे, भाप उगलते गरम-गरम समोसे नसीब हों।
हमारे काकाओं ने हमें ज़िंदगी की पहली व्यवहारिक शिक्षा दी थी—
“बेटा, पहले समोसे को अख़बार के काग़ज़ से चिबद (दबा) दे, फिर खा।”
ये थे पारिवारिक संस्कार, और आज की ये रिसर्च उन्हीं संस्कारों पर उँगली उठा रही है।
और तो और, जब कभी बुआ या चाची के साथ सफ़र होता और उनका व्रत रहता, तो पैसे पकड़ा देतीं—
“बस रुके तो मूँगफली ले आ।”
बस के रुकते ही हम दौड़ लगाते और ठेले वाले से अख़बार के कोन में गरम-गरम मूँगफली के दाने भरवाकर ला देते, जैसे कोई भारी पुण्य का काम किया हो।
और आज आप अचानक ये जानकारी लाकर हमें अपराधबोध से भर रहे हैं—जैसे हमने कोई पाप कर दिया हो।
और सुनो, भाईसाहब—
उस टाइम पर हमारे कितने ही रिश्तेदार एम.पी. रोडवेज़ में थे।इन सरकारी बसों वाली नौकरी में उनकी ज़िंदगी का शायद ही कोई दिन गुज़रा हो, जब अख़बार पर पोहे, समोसे, कचौरी या जलेबी न खाई हो।
तब आप ए.बी. रोड के ग्वालियर से लेकर इंदौर तक के शहरों के बस-स्टैंड के होटलों की “रेटिंग” पूछ लो—तो तुरंत ज्ञान दे देते थे—
“भैया, टाइम देख लेना…
सुबह छह बजे वाली उज्जैन–दिल्ली से निकल रहे हो तो शाजापुर में,
और सात बजे उज्जैन–ग्वालियर से जा रहे हो तो सारंगपुर में—
वहाँ गरम समोसे मिलेंगे, ऐसे कि चाय बाद में याद आएगी।”
सवारी के साथ कंडक्टर, ड्राइवर, क्लीनर—सब मिल-जुलकर खाते थे अख़बार के ऊपर रखे समोसे-कचौरी-पोहे।
तब न किसी को स्याही की चिंता थी, न गंभीर बीमारी की संभावना, न गूगल की सलाह—
बस चाय गरम होनी चाहिए और समोसा भाप उगलता।
और आपको बताएं तो आश्चर्य करोगे—वही हमारे बुज़ुर्ग परिजन आज रिटायर होकर रोज़ सुबह दस हज़ार स्टेप्स चलते हैं।
अब ट्रेन के सफ़र की बात करें।
जब परिवार के साथ उज्जैन–भोपाल का ट्रेन-सफ़र होता, तो घर से निकलते वक़्त पूरी-आलू की सब्ज़ी स्टील के डब्बे में रख ली जाती थी।
बेरछा आते-आते वो डब्बे खुल जाते; अगर काग़ज़ की प्लेटें न हों तो बाजू में बैठे किसी अजनबी से सहज ही पूछ लिया जाता—“भाई साहब, अख़बार पढ़ लिया क्या?”
वे मुस्कराकर कह देते—
“हाँ जी, ले लीजिए… मेरा हो गया।”
उसी अख़बार को फाड़-फाड़कर सबको पूरी-आलू दी जाती और पूरा ट्रेन का डिब्बा आलू की सब्ज़ी की खुशबू से भर जाता।
फिर उन्हीं अख़बार वाले भाई साहब से पूछा जाता—
“आप भी खा लीजिए हमारे साथ।”
वे हाथ जोड़कर कहते—“नहीं-नहीं, आज मेरा ग्यारस का व्रत है। नहीं तो बिल्कुल खाता- अपने घर की ही बात है |”
यही थी आत्मीयता।
किसी को डर नहीं लगता था कि सामने वाला कुछ मिला देगा या धोखा कर देगा।
आज अगर ट्रेन में कोई खाने को बढ़ा दे, तो मन सबसे पहले पूछता है—
“कहीं इसमें कुछ नशीला तो नहीं?”
आज विश्वास इतना टूट चुका है कि कोई गलती से खाने को पूछ ले, तो पूरा सफ़र उसे शक़ की नज़रों से देखा जाता है।
सच ही तो लिख गए हमारे बड़नगर के कवि प्रदीप जी—
“देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई, भगवान… कितना बदल गया इंसान!”
चलिए, अब घर पर आते हैं।
तब के पारिवारिक माहौल को लीजिए—घर में सेव-परमल का प्रोग्राम बनते ही तुरंत आवाज़ आती थी,
“जा बंटी, जा के अख़बार ले आ, सेव-परमल बिछाने के लिए।”
बंटी बड़े पुलकित मन से स्टोर-रूम से फ़िल्मी एडिशन वाला अख़बार निकाल लाता, और जूही चावला, माधुरी दीक्षित और श्रीदेवी कुछ ही पलों में सेव-परमल, नींबू, प्याज़ और धनिया के नीचे ग़ायब हो जातीं।
दस-बारह लोग एक साथ, मुट्ठी-भर-भरकर खाते दिख जाते—न कोई गिनती, न कोई शिष्टाचार, बस अपनापन।
वही अख़बार टेबल भी था, थाली भी,और बहाने से बातचीत शुरू कराने वाला मंच भी।
आज के ज़माने में बताइए, भैया—क्या कहीं बचा है इतना भाईचारा?
आज तो, साहब, व्हाट्सऐप पर एक साथ परिवार को बात करनी हो,तो उसका भी इवेंट रखा जाता है,
और आप हैं कि ये रिसर्च लाकर बता रहे हैं कि वह सब नहीं करना था।
हम कभी राजस्थान अपने रिश्तेदारों से मिलने जाते थे, तो कज़िन हमें बाज़ार ले जाते—“चलो भैया, प्याज़ की कचौरी खा के आते हैं।”
कचौरी का स्वाद तो अपनी जगह था, पर असली मज़ा उस राजस्थानी मनुहार में होता था—खिला कर मनवाने में।
“अरे भाईसाहब, आपको क़सम है… ये लो एक और ,” कहते हुए ज़बरदस्ती एक और कचौरी अख़बार के काग़ज़ पर रख दी जाती थी।
यही था अपनापन, यही था रिश्ता।
और अब आप ये ख़बर ले आए हैं कि वह सब ख़तरनाक था।
तो भैया, फिर सही क्या बचा?
क्या अब रिश्ते भी पैक होकर आएँगे—
हाइजीनिक, सीमित मात्रा में, और चेतावनी के साथ?
वापस उस ख़बर पर आते हैं, तो सबसे बड़ा सवाल अब भी वहीं खड़ा है—
आख़िर किस मीटिंग में यह तय हुआ होगा कि
“इलाज तो चलता रहेगा, पहले जनता को थोड़ा डराया जाए”?
क्योंकि डरा हुआ आदमी सबसे ज़्यादा आज्ञाकारी होता है—
वह सवाल नहीं पूछता, बस मैसेज फ़ॉरवर्ड करता है।
आज दुनिया अजीब तरह से दो हिस्सों में बँटी दिखती है—
एक तरफ़ वे लोग हैं जो दिन-रात बैठकर बीमारियों का इलाज खोज रहे हैं,
और दूसरी तरफ़ वे, जो हर रोज़ यह ढूँढ रहे हैं कि अगली बीमारी अब किस खाने के नीचे छिपकर बैठी है।
करो भैया, रिसर्च करो…
पर अगली बार ये मत ले आना कि बचपन में किसने स्लेट पर लिखने वाली पेम खाई थी और अब उन्हें ‘एंटी-पेम’ का वैक्सीन लगवाना पड़ेगा।
वो भी खाई है, भैया, हमारे ज़माने के भोले लोगों ने।
या फिर ये मत बताना कि जिन्होंने फ़ेविकोल को उँगलियों और हथेलियों पर चुपचाप सुखाकर उसकी परत उतारी थी, उन्हें अब स्किन-चेक करवानी पड़ेगी।
हमने तो ये सब ही किया है, साब—
स्कूल की घंटियों के बीच ज़िंदगी सीखते हुए,
साइकिल पर दोस्तों संग शहर भर की गलियाँ नापते ,
तब खुशी वाई-फाई से नहीं,
डाउनलोड से नहीं,
बस इन लम्हों में पूरी हो जाती थी।
- अख़बार पर समोसे खाने वाली पीढ़ी से

Bahut Badhiya
जवाब देंहटाएंएक नंबर
जवाब देंहटाएंशानदार
जवाब देंहटाएंलेख अच्छा लगा.
जवाब देंहटाएंलाजवाब. लिखते रहो. भाई हम स्थायी पाठक बन गए हैं.
जवाब देंहटाएंबहुत उमदा👌👌
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंबहुत शानदार पुरानी यादें के झरोखे से
जवाब देंहटाएं