संदेश

लाइट, कैमरा, एक्शन

चित्र
               शनिवार की सुबह कुछ खास होती है — थोड़ी सुस्त, थोड़ी अलसाई, पर अपने ही रंग में रंगी हुई। ना ऑफिस की भागदौड़, ना किसी अलार्म की टनटनाहट। आँखें धीरे-धीरे खुलती हैं, जैसे खुद को भी पता हो कि आज ज़रा सुकून से जीना है। चाय का पहला घूँट लेते ही दिल कहता है — 'चलो आज कोई फिल्म देखी जाए।' ह्यूस्टन-टेक्सास की मई की गर्मी कुछ-कुछ वैसी ही लगती है जैसी भारत के जेठ महीने की दोपहरी — बाहर की गर्म हवा जैसे कहती हो, 'घर में रहो'। पर इस बार प्लान बना लिया था — पास के मल्टीप्लेक्स में एक नई हिंदी फिल्म लगी थी। गूगल पर मूवी का टाइम देखा, मोबाइल निकाला, टिकट बुक की और आराम से तैयार होने लगे।  हल्का-फुल्का नाश्ता किया, और गाड़ी में बैठकर चल पड़े सिनेमा की ओर — लगभग १५ मील दूर। रास्ते में मद्धम म्यूज़िक बज रहा था, थोड़ी-सी बातचीत, थोड़ी-सी चुप्पी — जैसे फिल्म से पहले मूड खुद-ब-खुद सेट हो रहा हो। थिएटर पहुँचे — न टिकट काउंटर पर कोई लाइन, न गेट पर कोई धक्का-मुक्की , न हॉल में घुसने की भीड़ । सीधे हॉल में घुसे...