लाइट, कैमरा, एक्शन

 

            

शनिवार की सुबह कुछ खास होती है — थोड़ी सुस्त, थोड़ी अलसाई, पर अपने ही रंग में रंगी हुई। ना ऑफिस की भागदौड़, ना किसी अलार्म की टनटनाहट। आँखें धीरे-धीरे खुलती हैं, जैसे खुद को भी पता हो कि आज ज़रा सुकून से जीना है। चाय का पहला घूँट लेते ही दिल कहता है — 'चलो आज कोई फिल्म देखी जाए।'

ह्यूस्टन-टेक्सास की मई की गर्मी कुछ-कुछ वैसी ही लगती है जैसी भारत के जेठ महीने की दोपहरी — बाहर की गर्म हवा जैसे कहती हो, 'घर में रहो'। पर इस बार प्लान बना लिया था — पास के मल्टीप्लेक्स में एक नई हिंदी फिल्म लगी थी। गूगल पर मूवी का टाइम देखा, मोबाइल निकाला, टिकट बुक की और आराम से तैयार होने लगे। 

हल्का-फुल्का नाश्ता किया, और गाड़ी में बैठकर चल पड़े सिनेमा की ओर — लगभग १५ मील दूर। रास्ते में मद्धम म्यूज़िक बज रहा था, थोड़ी-सी बातचीत, थोड़ी-सी चुप्पी — जैसे फिल्म से पहले मूड खुद-ब-खुद सेट हो रहा हो।

थिएटर पहुँचे — न टिकट काउंटर पर कोई लाइन, न गेट पर कोई धक्का-मुक्की , न हॉल में घुसने की भीड़ । सीधे हॉल में घुसे। अंदर की एसी ठंडक ने मानो शरीर की गर्मी ही नहीं, पूरी हफ्ते की थकान भी खींच ली। गद्देदार कुर्सियों में आधे लेटकर, पॉपकॉर्न और कोल्ड ड्रिंक हाथ में लिए फिल्म देखना शुरू किया।

फिल्म खत्म होते ही एक अनकहा सा विश्लेषण शुरू — 'कहानी ठीक थी', 'डायरेक्शन कमजोर था', 'गाने ज़्यादा असर नहीं छोड़ पाए'। फिर सोचा, निकले हैं तो कुछ घर का सामान भी ले लें।

शाम ढलने लगी, और रात बिस्तर पर लेटते ही दिल ने धीरे से कहा — 'फिल्म तो देख ली, पर जाने क्यों... वो मज़ा नहीं आया। वो शोर, वो भीड़, वो तालियाँ, वो सीटी... कहीं खो गए हैं शायद।'

यहीं से मन फिर लौट गया — सीधे उस पुराने, ८०-९० के दशक में, जब थिएटर को ‘टॉकीज़’ कहा जाता था। उस समय किसी शहर की पहचान उसकी सड़कों या बाज़ारों से कम, और उसके टॉकीज़ों की संख्या से ज़्यादा होती थी। मानो शहर का कद, उसकी रौनक़ और उसकी चहल-पहल इसी बात से मापी जाती हो कि वहाँ कितने टॉकीज़ हैं — और जितनी बड़ी गिनती, उतना ही बड़ा शहर।

वो समय ही कुछ और था। न कोई ऑनलाइन बुकिंग, न एयर-कंडीशनिंग की सुख-सुविधा, न ही मल्टीप्लेक्स की चमक-दमक। शहर के अलग-अलग कोनों में फैले टॉकीज़, जैसे हर मोहल्ले का गौरव होते थे। कोई पुरानी हवेली में बना होता, तो कोई बस ईंट और सीमेंट से तैयार एक हॉल — पर दोनों में जुनून बराबर था।

टिकट की कीमत उस दौर में आपकी सीट और स्क्रीन के बीच की दूरी से तय होती थी। सबसे सस्ती सीटें परदे के बिलकुल नीचे होतीं — इतनी नज़दीक कि पूरी फ़िल्म गर्दन ताने देखनी पड़ती और इंटरवल तक गले की कसरत पूरी हो जाती। उससे थोड़ा पीछे शुरू होता ‘अपर स्टॉल’ — जहाँ नज़ारा साफ़, हवा थोड़ी ठंडी, और जेब पर थोड़ी ज़्यादा मार। उसके ऊपर एक छज्जेनुमा ऊँची गैलरी होती, जिसे सब ‘बालकनी’ कहते थे — यहाँ बैठना मानो किसी ने आपके सामाजिक दर्जे पर सोने की परत चढ़ा दी हो।

लेकिन असली शान तो बालकनी के पीछे छिपी होती — छोटा-सा बंद केबिन, जिसे ‘बॉक्स’ कहा जाता था। चार कुर्सियों वाला यह मिनी-राजमहल आम दर्शक के लिए सपने जैसा था। यहाँ सिर्फ़ टॉकीज़ मालिक के दोस्त, शहर के नामचीन व्यापारी, बड़े अफ़सर, या वे हस्तियाँ बैठतीं जिनके नाम अख़बारों में छपते थे। बॉक्स में बैठकर फ़िल्म देखना महज़ आराम का अनुभव नहीं, बल्कि पूरे शहर में यह ऐलान था — “हम यहाँ हैं, और हम ख़ास हैं।”

घर या दुकान का पता बताने के लिए इतना कहना काफी होता — "रीगल टॉकीज़ से अगली गली," और सामने वाला मुस्कुराकर तुरंत समझ जाता। टॉकीज़ न केवल रास्ता बताने का जरिया थे, बल्कि वो किसी शहर की पहचान का हिस्सा बन चुके थे।

हर टॉकीज़ का अपना मिज़ाज होता था। कुछ महलनुमा दीवारों में इतिहास बसा होता, तो कुछ में दीवारों पर पुराने पोस्टरों के निशान। लकड़ी की सीधी बेंचें, पसीने से भीगी भीड़, खिड़कियों से झांकती धूप और गर्म हवा का झोंका — लेकिन जैसे ही लाइट बुझती और परदे पर "ईस्टमैन कलर या सिनेमास्कोप " चमकता — पूरा माहौल जादुई हो जाता।

पहली सीट से लेकर पिछली कतार तक — हर कोई अपने-अपने तरीके से फिल्म में डूब जाता। कोई हीरो की एंट्री पर सीटी बजाता, कोई डायलॉग के साथ खुद बोल पड़ता। बच्चे ज़ोर से हँसते, और बड़े मन ही मन मुस्कुरा देते। फिल्म देखना उस दौर में एक सामाजिक त्योहार जैसा होता था — हॉल के अहाते गन्ने का रस, मूँगफली, और चाय , समोसे |

चूँकि पिताजी और सारे काका शासकीय सेवा में थे और हमारा परिवार मालवा के ही विभिन्न शहरों में वर्षों तक रहा, तो मालवा का शायद ही कोई ऐसा कस्बा हो जहाँ की गलियों, बाजारों और टॉकीज़ से परिचय न रहा हो।

इंदौर, उज्जैन, मंदसौर, नीमच, रतलाम, शाजापुर, देवास, ब्यावरा, राजगढ़, शुजालपुर, नागदा, आगर, सारंगपुर, पचोर, कुरावर, मक्सी, सुसनेर, बड़नगर, बदनावर, नलखेड़ा — हर शहर में या तो रिश्तेदार थे या मित्र, और यही वजह थी कि वहाँ के टॉकीज़ भी अपनी सी लगते थे।इंदौर की रौनक अलग, शाजापुर की सादगी अलग, मंदसौर और रतलाम के टॉकीज़ में अलग ठाठ था।देवास में फिल्में देखने वालों की भीड़, और नीमच और ब्यावरा में शांत कस्बाई माहौल में चलते शो — ये सब अनुभव थे, जो सिर्फ फिल्म देखने तक सीमित नहीं थे, बल्कि एक ज़माने की संस्कृति में रचे-बसे थे।इंदौर और भोपाल जैसे बड़े शहरों में तीस से पचास तक टॉकीज़ हुआ करते थे — हर इलाक़े में एक या दो। उज्जैन में पंद्रह-बीस तो होते ही थे। शाजापुर, ब्यावरा जैसे छोटे ज़िलों में दो-तीन, और कस्बानुमा शहरों में भी अमूमन दो या तीन टॉकीज़ मिल ही जाते। उनमें से एक टॉकीज़ अक्सर शहर से ज़रा बाहर होता — एक ऐसा टॉकीज़ जहाँ वो फ़िल्म लगती जिसे देखने "वोट देने लायक" उम्र के लोग ही जाते। बाकी टॉकीज़ शहर के अंदरूनी हिस्सों में होते, जहाँ पारिवारिक माहौल में थोड़ी नई फ़िल्में लगतीं।

कस्बों में "नई" फ़िल्म का मतलब होता — जो फ़िल्म बड़े शहरों में दो-तीन हफ्ते चल चुकी हो, वही अब छोटे क़स्बे में लगी है। फिर भी उस टॉकीज़ में जबरदस्त भीड़ होती, ख़ासकर साप्ताहिक हाट के दिन। बैलगाड़ियाँ, ट्रैक्टर — सब टॉकीज़ के बाहर वाले मैदान में खड़े रहते। दिन के शो हाउसफुल रहते — मैटिनी शो , तीन का, छह का, नौ का... और कुछ जगहों पर तो आधी रात वाला बारह बजे का शो भी चलता।

फ़िल्म के पोस्टर हाथ से पेंट किए जाते — वही पुराने आर्टिस्टों का हुनर। पोस्टर या तो टॉकीज़ के बाहर टंगे होते या फिर शहर भर में ऑटो रिक्शा से घूम कर प्रचार होता — लाउडस्पीकर पर नायक-नायिका का नाम लेकर फिल्म का ऐलान। शहर में एक उत्सव जैसा माहौल बन जाता था जब कोई “बड़ी” फ़िल्म लगती — जैसे त्रिदेव,मैंने प्यार किया , राम लखन, या घायल।

मुझे अपने लड़कपन की स्मृति आयी जब मैंने अपनी पहली फिल्म बड़े परदे पर देखी थी ८वीं की परीक्षा के उपरांत, जिसकी योजना तो पिछली अंग्रेजी परीक्षा के बाद ही बन चुकी थी — आख़िरी हिंदी वाले पेपर के दिन मूवी देखने चलेंगे, "किशन कन्हैया"। फिल्म अभी-अभी रिलीज़ हुई थी और पूरे उज्जैन और मालवा क्षेत्र में उसकी धूम थी।लगभग हर चौराहे , टेम्पो , नाई की दुकान , पान की दुकान पर उसके गाने की धूम थी | घरवालों से इजाज़त पहले ही ले ली गई थी और जेबों में सबके दस-दस रुपये थे — उस ज़माने में किसी स्कूली लड़के के पास इतने पैसे होना किसी ख़जाने से कम नहीं लगता था।

यूँ तो कितनी ही मूवी मैं किराये के या अपने घर के वीसीआर पर देख चूका था पर ये पहला अवसर था की किसी टॉकीज़ में मूवी देखने का |

जैसे ही आख़िरी पेपर खत्म हुआ, हम क्लास के चारों मित्र अपनी-अपनी साइकिलों पर सवार होकर पहुँच गए कमल टॉकीज़। वहाँ ५- ५ रुपये के टिकट खरीदे गए — हाथ से फाड़े गए मोटे कागज़ के टिकट — और फिर टोर्च वाले चाचा की मदद से हम अपनी सीटों तक पहुँचे।बालमन रोमांचित हो उठा — इतना बड़ा पर्दा! चारों ओर अंधेरा, और जब फिल्म शुरू हुई तो जैसे किसी जादुई लोक के द्वार खुल गए। तेज़ आवाज़, संगीत, और दर्शकों की सीटियाँ-तालियाँ — सब कुछ अभूतपूर्व था। माधुरी दीक्षित की मुस्कान और अनिल कपूर की अदाएं जैसे परदे से बाहर निकलकर हमारे पास आ रही हों। हर दृश्य, हर संवाद दिल में उतरता जा रहा था।इंटरवल में गर्मागरम समोसे लिए — कुरकुरे, मसालेदार समोसे, जिनकी ख़ुशबू ही आनंदित कर देती थी। उन्हें खाते हुए हम फिर अपनी सीटों पर लौट आए। अब हमारे पास न पढ़ाई की चिंता थी, न रिज़ल्ट का डर। बस था तो दो महीने की गर्मियों की छुट्टियों का खुला आकाश, और उस पर छाया हुआ बड़े पर्दे का सुनहरा जादू।

हमारा पैतृक घर राजगढ़ ज़िले के ब्यावरा कस्बे में था, तो शादी-ब्याह या त्यौहारों के मौके पर वहाँ आना-जाना लगा रहता था। घर के ठीक पास ही एक टॉकीज़ था — नाम था विनोद । जिसका नाम बदलकर बाद में विवेक हो गया  दूरी इतनी कम कि घर से निकलो तो सौ कदम भी नहीं लगाने पड़ते। रात के शो के वक्त क़स्बा सो जाता और जब टॉकीज़ में नाईट शो फिल्म चल रही होती, तो डायलॉग हवा में तैरते हुए सीधे हमारे मोहल्ले के घरों के आँगन में आ पहुँचते। मोहल्ले के बच्चों को तो कई फिल्मी संवाद रट गए थे — "मैं तुम्हारा ख़ून पी जाऊँगा!" जैसे डायलॉग घर के कोने-कोने में गूंजते थे। अगर नींद न आ रही हो तो वो पिक्चर के साथ में ही डायलॉग बोलते थे | शुरुआत में टॉकीज़ कुछ खास बना-ठना नहीं था। पक्की दीवारें नहीं, बस टेंट से घिरी हुई जगह और ज़मीन पर बैठने के लिए अपनी दरी लानी पड़ती थी। लेकिन धीरे-धीरे विवेक टॉकीज़ भी पक्का होता गया — जैसे-जैसे फिल्मों की दुनिया मोहल्ले की ज़िंदगी में गहराई से उतरती गई।

उन्हीं दिनों का एक किस्सा आज भी उतना ही ताज़ा है, जैसे कल ही हुआ हो। मेरे बड़े भैया, जो तब ९ वीं-१० वीं में पढ़ते थे, गर्मी की छुट्टियों की एक तपती दोपहर अपने एक जिगरी दोस्त के साथ चोरी-छिपे विवेक टॉकीज़ में फिल्म देखने पहुँच गए। उस ज़माने में घर के बच्चों का टॉकीज़ जाना वैसा ही माना जाता था जैसे बग़ावत का एलान — “लड़का हाथ से निकल गया!”

किस्मत देखिए, शो के बीच ही किसी जान-पहचान वाले ने उन्हें पहचान लिया और सीधा जाकर मेरे दादाजी को ख़बर दे दी —

“आपका पोता टॉकीज़ में पिक्चर देख रहा है!”

दादाजी, जो वैसे भी अनुशासन के लिए मशहूर थे, गुस्से से तमतमाए सीधे टॉकीज़ की ओर चल पड़े। पहुँचते ही बाहर से गूँजती हुई आवाज़ लगाई —

“ओ गिरिराज! बाहर आओ!”

अंदर बैठे भैया और उनके दोस्त की हालत वैसी हो गई जैसे फिल्म के हीरो को अचानक पुलिस पकड़ने आ गई हो। पसीना, घबराहट, और दिल की धड़कन तेज़।

फिर जो किया, वो किसी थ्रिलर फिल्म का चरम सीन लग रहा था — बिना किसी की नज़र में आए, दोनों ने टेंट की दीवार के नीचे से ऐसे सरककर बाहर निकलने की कलाकारी दिखाई, मानो बरसों से स्पाई ट्रेनिंग ले रहे हों। और फिर बिना पीछे मुड़े, तीर की रफ़्तार से घर की ओर दौड़ पड़े।

उस दिन की कहावत यही बनी — जान बची, तो लाखों पाए… और फिल्म अधूरी सही!

दूसरा किस्सा मेरे छोटे मामा से जुड़ा है। मेरी उम्र रही होगी कोई १९-२० साल और छोटे मामा मुझसे कुछ ३-४ साल बड़े। वो साल में एक-दो बार बीनागंज से उज्जैन आते — और आते भी ऐसे जैसे कहीं से नहीं, किसी फिल्मी सीन से प्रकट हुए हों! हमेशा जल्दी में रहते। आते ही मम्मी-पापा से थोड़े बतियाते , दो निवाले पेट में डालते और फिर वही पुरानी रट शुरू — "थोड़ा बाजार में काम है, फिर सीधी दोपहर की बस पकड़ लूंगा।"

पर हम सब समझते थे कि 'बाजार का काम' असल में क्या होता था — नयी लगी पिक्चर देखना!

मुझे देखते ही कहते —

“चल बेटा, साइकिल निकाल... बस स्टैंड तक छोड़ देना।”

साइकिल वहीं चलाते थे .लेकिन वो बस स्टैंड कहाँ, वो तो सीधे साइकिल घुमाते तीन बत्ती के अगले चौराहे से सीधे भतवाल टॉकीज़ |जैसे ही पहुंचते, झटपट दो टिकट स्टाल क्लास के — और फिर शुरू होता असली मज़ा पैर फैलाकर, मूड बनाकर फिल्म देखना। कोई रोक-टोक नहीं, कोई डांट-फटकार नहीं। बस मामा और मैं, थोड़ी से भीड़ और बड़ा पर्दा।मामा तो खास किस्म के 'फिल्म विश्लेषक' थे — फिल्म खत्म होने से करीब 20 मिनट पहले ही अंदाज़ा लगा लेते थे कि “अब हीरो विलेन को मार देगा” या “हीरोइन की शादी हो जाएगी हीरो से” या “हेरोइन का बाप मान जायेगा” या “विलन को लेने पुलिस आ जाएगी !” और हम दोनों उठकर निकल लेते — ताकि भीड़ से बचकर आराम से बस स्टैंड पहुंच सकें। प्रेम, साजन, दिल — कई फिल्मों के फर्स्ट डे, फर्स्ट शो हम लोगों ने ऐसे ही देखे। और फिर मामा चले जाते — अगली बार कब आएँगे, ये न तय था, लेकिन जब भी आते, एक साइकिल राइड, एक फिल्म और ढेर सारी यादें छोड़ जाते।

भोपाल के मेरे कॉलेज दिनों का एक और किस्सा है, बात तब की है जब छठें सेमिस्टर के फाइनल एग्ज़ाम चल रहे थे—स्टील स्ट्रक्चर का पेपर बस एक दिन बाद था। किताबें फैली थीं, दिमाग़ गणितीय समीकरणों में उलझा था, तभी कमरे पर जोरदार ठक-ठक-ठक! हुई।

दरवाज़ा खोला तो सामने पड़ोस के रितुराज भैया खड़े थे, आंखों में चमक, साँस थोड़ी तेज़—

"जल्दी चलो! बॉर्डर रिलीज़ हो गई है, आधे घंटे में शो शुरू!"

मैंने किताब की तरफ इशारा करते हुए कहा, "भैया, परसो पेपर है..."

उन्होंने हाथ हिलाकर चलने का इशारा किया और जैसे ये बहाना हवा में उड़ा दिया—

"एग्ज़ाम हर साल होते हैं, बॉर्डर हर रोज़ नहीं आती!"

बस फिर क्या था, मैंने भी टी-शर्ट-जीन्स पहनी, और हम उनके स्कूटर पर फुर्र से निकल पड़े। पाँच मिनट में ज्योति टॉकीज़ पहुँचे... और वहाँ का नज़ारा—अरे भाई, मानो मेला लगा हो! लोग ऐसे उमड़े थे जैसे बॉर्डर नहीं, इंडिया-पाकिस्तान का मैच देखने आए हों।टिकट मिलना तो दूर, गेट तक पहुँचना अपने आप में वीरता का काम था। 

भैया ने मुझसे कहा "तू यहीं स्कूटर पर बैठ, मैं आता हूँ टिकट लेकर।"

वो पहले लेडीज़ लाइन की तरफ बढ़े—२ -३ महिलाओं से मीठी-मीठी विनती की, “दीदी, २ टिकट दिला दो।” लेकिन किसी ने मदद नहीं की। पुलिस वाले के डाँटते ही वो वहां से हटे और अब जेंट्स लाइन में घुसपैठ शुरू।

लाइन लंबी थी, लोग चिल्लाने लगे—

"ओए! लाइन तोड़ रहा है!"

भैया ने तुरंत मासूमियत ओढ़ ली, "भाई, मेरा छोटा भाई आगे खड़ा है, उसी के पास जा रहा हूँ।"

तभी पुलिस वालों ने जेंट्स की लाइन को काबू में रखने के लिए हवा में लाठियाँ घुमानी शुरू कर दीं। “थड़ाक-थड़ाक” की आवाज़ और लाठी की सरसराहट सुनते ही भीड़ में भगदड़ मच गई—कोई इधर भागा, कोई उधर, सब तितर-बितर।

भैया ने तुरंत मौका भांप लिया—तेज़ी से आगे बढ़े और सीधे लाइन में जा खड़े हुए। भीड़ जैसे वापस सँभली, लोग फिर से कतार में जुड़ने लगे, पर अफरा-तफरी में किसी को होश ही नहीं था कि कौन कहां से आया।

अभी टिकट खिड़की तक पहुंचने ही वाले थे कि एक दुबला-पतला लड़का नीला क़मीज़ पहने हांफते हुए आया, ५० का नोट थमाते हुए बोला, “भाई… हमारी भी दो ले लेना।” भैया ने बिना कुछ पूछे पैसे जेब में डाले और खिड़की पर पहुंचते ही कहा—“चार बालकनी देना ।” पर टिकट बाबू ने आंखें तरेर कर कहा, “दो से ज़्यादा नहीं मिलेंगे!” मजबूरी में भैया ने सिर्फ दो टिकट लिए और बाहर आकर उस नीले क़मीज़ वाले को ढूंढने लगे। पर पुलिस की डांट से वो बेचारा जाने कहां गुम हो गया था।

हमने स्कूटर दोस्त के घर से थोड़ी दूर खड़ा कर दिया था। वहीं से दौड़ते-भागते दोबारा ज्योति टॉकीज़ पहुँचे और अगले दो-तीन मिनट तक उस लड़के को ढूँढते रहे। पर अब उसका चेहरा जैसे धुंध में खो चुका था — याद में बस नीला क़मीज़ ही बची थीं ।

इतने में “हाउस फुल” का बोर्ड लटक गया और अंदर से फिल्म शुरू होने की घंटी बज उठी। हम भी बिना वक्त गवाँएं टिकट थामे अंदर घुसे… और जैसे ही पर्दा उजला, “बॉर्डर” के पहले ही दृश्य ने सारा तनाव भुला दिया। 

इंटरवल में हम दोनों बाथरूम के लिए उठे। भैया ने कहा, "तू जा, मैं आता हूँ सीट पर।"

जब भैया लौटे, तो मेरा मुँह खुला का खुला रह गया — उनके हाथों में दो थम्स-अप की बोतलें, दो गरमागरम समोसे, एक बड़ा पॉपकॉर्न और एक मूँगफली का पैकेट!

मेरे लिए ये नज़ारा किसी चमत्कार से कम नहीं था। भैया के साथ मैं २- ३ पिक्चर पहले भी देख चुका था, लेकिन ऐसी "रईसी" तो कभी नहीं देखी। उस दौर में तो टिकट के पैसे ही जुटाना बड़ी बात होती थी — ये दावत कहाँ से आ गई?

मैंने हैरान होकर पूछा, "भैया, ये सब कैसे?"

उन्होंने बस मुस्कुराकर कहा, "तू खा… फिल्म शुरू होने वाली है।"

पिक्चर शानदार थी और सुपरहिट भी। लेकिन जैसे ही खत्म हुई, भैया फटाफट खड़े हो गए — "चल, जल्दी!"

मैंने कहा, "अरे, आराम से निकलते हैं।"

तब भैया ने दावत का राज़ खोला — "जो तूने इंटरवल में दावत उड़ाई थी, वो उसी नीले क़मीज़ के पैसे से थी। अगर वो गेट के पास हमारा इंतज़ार कर रहा हुआ, तो उसे देने के लिए सिर्फ 10 रुपये बचे हैं… और ऊपर से स्कूटर में पेट्रोल भी डलवाना है!"

ये सुनते ही मैं भी उनके साथ रफ़्तार पकड़कर तेज़ चलने लगा। गेट के आसपास नज़र दौड़ाई — जो भी दिखा, हमें वही नीली क़मीज़ वाला लगा! बस फिर क्या था, हम सीधे रोड पर निकल लिए। टॉकीज़ से बाहर निकलते वक्त हमारी चाल इतनी तेज़ थी जैसे कोई पीछे से पकड़ने दौड़ रहा हो — और तब जाकर दोस्त के घर पहुँचकर ही सांस ली।

खैर, विडम्बना देखिए—उस स्टील स्ट्रक्चर वाले पेपर में मेरे सबसे ज़्यादा नंबर आए। शायद इंटरवल के समोसे और मूंगफली ने दिमाग़ को अतिरिक्त ताकत दे दी थी। आज भी जब हम दोनों मिलते हैं, तो उसी नीले क़मीज़ वाले को हमेशा कृतज्ञ हो के याद करते हैं। दिल से उसको दुआ देते है —क्योंकि अगर वो उस दिन पचास रुपये हमें न थमाता, तो न “बॉर्डर” का इतना मज़ा आता… और न पेपर में टॉप करने की ये मीठी याद बनती।

ऐसे कितने ही किस्से हैं—अलग-अलग शहरों के, अलग-अलग सिनेमाघरों के। अब तक मैं दुनिया के २-३ देशों के ४०-५० शहरों में कितनी ही फिल्में देख चुका हूँ। मल्टीप्लेक्स, बड़े स्क्रीन, शानदार साउंड—सब कुछ मिल जाता है।लेकिन वो मज़ा, वो रोमांच… जो लड़कपन और जवानी के दिनों में खाली जेब लेकर फिल्म देखने में था—वो कहीं और नहीं।जहाँ टिकट लेना किसी जंग जीतने जैसा और इंटरवल का समोसा किसी दावत से कम नहीं लगता था।

तो चलिए… आप भी अगली मूवी का टिकट मोबाइल पर बुक कर लीजिए।

हो सकता है इस बार स्क्रीन पर कोई नई कहानी चले, लेकिन दिल में बस जाए वही पुराना जादू—वो जो हर शो के बाद यादों के एल्बम में एक नया फोटो चुपचाप चिपका देता है।

आख़िर ज़िंदगी भी तो बस यही है—एक के बाद एक शो… और हम सब, अपने-अपने टिकट लिए, अपनी-अपनी सीट पर बैठे दर्शक।

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