संदेश

मन पर बैठा मैनाक

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अस्सी के दशक का वह आख़िरी दौर, जब क्रिकेट मैच का समय जैसे ही आता, लोग दूरदर्शन से चिपक जाते थे। जिन घरों में टीवी नहीं होता था, वहाँ लोग रेडियो सुनने लगते, और जहाँ रेडियो नहीं होता था, वहां ट्रांजिस्टर, और जहाँ ट्रांजिस्टर भी नहीं होता था, वहाँ चाय–पान की दुकानों पर बजती कमेंट्री ही सबका सहारा बनती। देश में हर कोई क्रिकेट विशेषज्ञ बन चुका था। मैच देखते हुए कोई कहता — “अज़हरुद्दीन ने कलाई ज़्यादा मोड़ ली।” कोई तर्क देता — “कपिल देव को इनस्विंग डालनी चाहिए।” तो कोई कर्नल को सलाह देता — “इस गेंद पर स्वीप मारने की ज़रूरत नहीं थी, बैकफुट पर जाकर कट करना चाहिए था।” अटक से लेकर कटक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक — क्रिकेट हर दिल की धड़कन बन चुका था। यह केवल खेल नहीं था; यह धर्म था, त्योहार था और उत्सव का बहाना भी। चाहे महानगरों की चौड़ी सड़कें हों या कस्बों की गलियाँ, गाँव की चौपालें हों या खेत–खलिहान — हर जगह बस क्रिकेट ही गूँज रहा था। किसानों का देश भारत अब गर्व से क्रिकेट का देश कहलाने लगा था। जिस तरह देशभर में क्रिकेट दीवानगी बन गया था, उसी तरह उज्जैन भी उससे अछूता नहीं रहा। देश के हर छ...

लाइट, कैमरा, एक्शन

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               शनिवार की सुबह कुछ खास होती है — थोड़ी सुस्त, थोड़ी अलसाई, पर अपने ही रंग में रंगी हुई। ना ऑफिस की भागदौड़, ना किसी अलार्म की टनटनाहट। आँखें धीरे-धीरे खुलती हैं, जैसे खुद को भी पता हो कि आज ज़रा सुकून से जीना है। चाय का पहला घूँट लेते ही दिल कहता है — 'चलो आज कोई फिल्म देखी जाए।' ह्यूस्टन-टेक्सास की मई की गर्मी कुछ-कुछ वैसी ही लगती है जैसी भारत के जेठ महीने की दोपहरी — बाहर की गर्म हवा जैसे कहती हो, 'घर में रहो'। पर इस बार प्लान बना लिया था — पास के मल्टीप्लेक्स में एक नई हिंदी फिल्म लगी थी। गूगल पर मूवी का टाइम देखा, मोबाइल निकाला, टिकट बुक की और आराम से तैयार होने लगे।  हल्का-फुल्का नाश्ता किया, और गाड़ी में बैठकर चल पड़े सिनेमा की ओर — लगभग १५ मील दूर। रास्ते में मद्धम म्यूज़िक बज रहा था, थोड़ी-सी बातचीत, थोड़ी-सी चुप्पी — जैसे फिल्म से पहले मूड खुद-ब-खुद सेट हो रहा हो। थिएटर पहुँचे — न टिकट काउंटर पर कोई लाइन, न गेट पर कोई धक्का-मुक्की , न हॉल में घुसने की भीड़ । सीधे हॉल में घुसे...