मन पर बैठा मैनाक

अस्सी के दशक का वह आख़िरी दौर, जब क्रिकेट मैच का समय जैसे ही आता, लोग दूरदर्शन से चिपक जाते थे। जिन घरों में टीवी नहीं होता था, वहाँ लोग रेडियो सुनने लगते, और जहाँ रेडियो नहीं होता था, वहां ट्रांजिस्टर, और जहाँ ट्रांजिस्टर भी नहीं होता था, वहाँ चाय–पान की दुकानों पर बजती कमेंट्री ही सबका सहारा बनती। देश में हर कोई क्रिकेट विशेषज्ञ बन चुका था। मैच देखते हुए कोई कहता — “अज़हरुद्दीन ने कलाई ज़्यादा मोड़ ली।” कोई तर्क देता — “कपिल देव को इनस्विंग डालनी चाहिए।” तो कोई कर्नल को सलाह देता — “इस गेंद पर स्वीप मारने की ज़रूरत नहीं थी, बैकफुट पर जाकर कट करना चाहिए था।”

अटक से लेकर कटक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक — क्रिकेट हर दिल की धड़कन बन चुका था। यह केवल खेल नहीं था; यह धर्म था, त्योहार था और उत्सव का बहाना भी। चाहे महानगरों की चौड़ी सड़कें हों या कस्बों की गलियाँ, गाँव की चौपालें हों या खेत–खलिहान — हर जगह बस क्रिकेट ही गूँज रहा था। किसानों का देश भारत अब गर्व से क्रिकेट का देश कहलाने लगा था।

जिस तरह देशभर में क्रिकेट दीवानगी बन गया था, उसी तरह उज्जैन भी उससे अछूता नहीं रहा। देश के हर छोटे–बड़े शहर की तरह उज्जैन के मोहल्लों में भी बल्ले–गेंद की खटखट हर जगह गूँज उठ रही थी। उज्जैन की गलियों, चौराहों, मैदानों, सड़कों, पार्कों, घाटों और मंदिरों के आँगनों तक — हर जगह क्रिकेट का राज था। पुराने उज्जैन के कंठाल, ढाबा रोड, जयसिंहपुरा, तोपखाना, इंदिरा नगर से लेकर रेलवे ओवरब्रिज के वहां से नए उज्जैन तक — जहाँ फ़्रीगंज टावर से एक ओर इंदौर रोड, दूसरी ओर देवास रोड और तीसरी ओर मक्सी–शाजापुर रोड जाती हैं। इन सड़कों तक फैले उज्जैन शहर की सीमा के भीतर, जहाँ भी कुछ भी खाली स्थान मिलता, बच्चे बल्ला–गेंद लेकर उतर आते। गली का मोड़, खुला मैदान या कोई खाली ज़मीन — हर कोना मानो क्रिकेट का मैदान बन जाता।

कहीं सुबह की हल्की ठंडक में, कहीं दोपहर की तपन में, तो कहीं देर रात दुकानों के शटर गिरने के बाद। कहीं टेनिस बॉल का ऊँचा उछाल, कहीं कॉर्क बॉल की खतरनाक तेज़ी, कहीं प्लास्टिक बॉल की टक–टक आवाज़, और कहीं मैदानों में लेदर बॉल का पेशेवर अंदाज़।

भैरवगढ़ के काल भैरव मंदिर से लेकर इंदौर रोड के शनि मंदिर तक — हर ओर यह खेल धड़कनों की तरह गूंजता था। दशहरा मैदान में एक साथ दस–बीस टीमें टकरातीं। क्षीरसागर मैदान की तपती धूप में कई गेंदें एक साथ हवा में उड़तीं। मॉडल स्कूल का ढलानदार मैदान बल्ले–गेंद की खटखट से गूँज उठता था। माधव कॉलेज का मैदान अक्सर चौकों–छक्कों की आवाज़ और अपीलों की गूँज से भरा रहता।

खेल के बीच मालवी बोली पूरे माहौल को और भी जीवंत बना देती थी —

“चलो रे, पैसे भेले करो…गेंद लानी पड़ेगी।”

“सुर्रा मत डाले नी, बारीक… कित्ती बार केऊँ!”

“दाँव आ गया दाँव… छोड़ना नी रे, कूटना लपक के!”

“बेंड़े, सीधी डाले ना रे… कित्ती वाइड डाल रिया?”

“चेट गई रे गेंद म्हारे पैर पे, नाना!”

“स्टार आग्या भिया, स्टार! अब आन दो भाटा गेंदे!”

“कियों लजवा रिया है? हेंच के मारे नी!”

“बड़े भिया नी मान रिए… अब तो छक्का सटकायेंगे!”

कभी पोहा–जलेबी की शर्त पर, कभी गरमा–गरम समोसे–कचौरी की, तो कभी सिर्फ़ गेंद अदला–बदली की शर्त पर मैदान में मैच खेले जाते थे। इन छोटी–छोटी पिचों पर हर बच्चा खुद को कभी गावस्कर, कभी कपिल, तो कभी शास्त्री मानकर बल्ला झूलाता था। महाकाल मंदिर की घंटों की गुंजन मानो बल्ले–गेंद की टक–टक में घुल जाती थी।

वह दिन थे, जैसे ही शाम के पाँच बजते, हमारी कॉलोनी का छोटा–सा मैदान अचानक जीवंत हो उठता। चारों ओर घरों के बीच तार की बाड़ से घेरा हुआ वह छोटा–सा पार्कनुमा मैदान, जिसके हर कोने में गाजर घास उगी रहती। बीच में एक बड़ा कुआँ मुँह खोले खड़ा रहता और इधर–उधर छोटे–छोटे गड्ढे मानो छुपे हुए फ़ील्डर की तरह पड़े रहते। लेकिन हमारे लिए वही ऊँचा–नीचा, टेढ़ा–मेढ़ा टुकड़ा किसी वानखेडे जैसा था।

कॉलोनी के दस–बारह लड़के, जिनकी उम्र छठी से दसवीं तक की किताबों में बसी हुई थी, शाम होते ही मैदान पर पहुँच जाते। देखते ही देखते सन्नाटा चीरता और हवा में हँसी, ठिठोली, छोटे–मोटे झगड़े और जोश भर जाता।

पूरी टीम के पास किट में एक पुराना फिशकवर बैट, एक टेनिस गेंद और चार लकड़ी के स्टंप थे। वही बैट, जिसके हैंडल पर बड़ी मेहनत से रबर की ग्रिप चढ़ाई गई थी। उस ग्रिप को चढ़ाने में जितना पसीना बहा, उतना शायद किसी असली मैच में रन बनाने में भी न बहता था।

वो टेनिस बॉल, जिसे खरीदने के लिए सबने घर से एक–एक रुपया जोड़कर किसी तरह जुगाड़ किया था।

और स्टंप — तीन तो बल्लेबाज़ी वाले छोर पर टिके रहते, और बचा एक नॉन–स्ट्राइकर के छोर पर खामोश खड़ा रहता।

न कोई रोलर, न कोई घास काटने की मशीन।

लगातार दौड़–दौड़कर खेलते–खेलते घास खुद ही समतल हो चुकी थी।

जहाँ गेंदबाज़ रन–अप लेता, वहाँ ज़मीन चमककर पत्थर जैसी चिकनी हो जाती।

और जहाँ बल्लेबाज़ खड़ा होता, वहाँ मिट्टी इस तरह घिस गई थी, मानो बरसों से अंतरराष्ट्रीय मैच खेले जा रहे हों।

लेकिन असली पहचान हमारी सिर्फ़ खेल से नहीं थी,

बल्कि गेंद निकालने की विशेषज्ञता से थी।

अगर मैच के बीच में बॉल कुएँ में जा गिरे, तो बाकी कॉलोनियों के लड़के भी जानते थे —

“अब यह काम सिर्फ़ इन्हीं के बस का है।”

हमारी ट्रिक मशहूर थी —

एक लंबा बाँस,

जिसे आगे से हल्का काटकर उसमें छोटी लकड़ी फँसा दी जाती,

और वह पंजे की तरह बॉल को जकड़कर बाहर खींच लाता।

गेंद बाहर आती, और फिर अगली चुनौती होती — गाजरघास के बीच छिपी गेंद को ढूँढ़ना।

हमारे लड़के उसमें भी माहिर थे — कुछ ही मिनटों में गेंद वापस हाथ में आ जाती और खेल फिर चालू हो जाता।

यही वजह थी कि सिर्फ़ हमारी कॉलोनी ही नहीं, बल्कि ऋषि नगर, संत नगर और सुभाष नगर के लड़के भी हमारी इस जुगाड़ू कला की दाद देते।

गर्मियों की छुट्टियाँ लगे महीने भर से ऊपर हो चुकी थीं। उसी छुट्टी का वह एक और दिन — जब मोहल्ले का मैच अपने आख़िरी और सबसे रोमांचक पड़ाव पर था। घर जाने का वक़्त बीत चुका था, मगर हम सब मैदान में जमे थे। पश्चिम में ढलते जेठ के सूरज की आख़िरी सुनहरी किरणें ज़मीन पर बिखरी थीं और मैं बल्ला ताने क्रीज़ पर खड़ा था। टीम की आधी–अधूरी उम्मीदें अब पूरी तरह मुझ पर टिक गई थीं।

आउट हो चुके कोने में बैठे मेरे साथी लगातार चिल्ला रहे थे — “भाई, बस एक गेंद में दो रन चाहिए… बस मार दे, जीत हमारी है!”

गेंदबाज़ दौड़ा। उसके हाथ से गेंद छूटी और धुँधलके में धुंधली–सी नज़र आई। मैंने अंदाज़ा लगाया, साँस रोकी और बल्ला पूरी ताक़त से घुमा दिया।

ठक्! बल्ले और गेंद की टक्कर से पूरा मैदान गूँज उठा। उधड़ी हुई पीली टेनिस बॉल हवा को चीरती हुई फील्डर के ऊपर से, गड्ढों और घास की झाड़ियों को पार करती सीधी मैदान के छोर पर लगी तार–बाड़ से टकराई — चौका!

फिर तो जैसे ज्वालामुखी फट पड़ा। कोई उछला, कोई नाचा, कोई मुझे गले लगाने दौड़ा। वह जीत हमारे लिए किसी वर्ल्ड कप फाइनल से कम नहीं थी। उस पल मैं टीम का श्रीकांत भी था, कपिल भी और अजहर भी। गर्व और खुशी से दिल ढोलक की तरह धड़क रहा था — वाह! अंधेरे में भी टीम को जिता दिया। लेकिन जश्न के बीच अचानक याद आया कि घरवालों के कड़े आदेश थे, “दीया लगने से पहले घर आ जाना।” अब अंधेरा गहराने लगा था। सब हड़बड़ाकर अपने–अपने घरों की ओर निकल पड़े। मैं और मेरा भाई भी एक साथ घर की ओर चल पड़े। दो–ढाई घंटे के खेल से भूख पेट में जिम्नास्टिक कर रही थी। विजयी चौके की गूँज अब भी सीने में तरंगें पैदा कर रही थी — जैसे दिल ही तार–बाड़ बन गया हो और उस पर गेंद अब भी टकरा रही हो।

हाथ में बैट लिए हम मैदान से आठ–दस कदम ही बाहर निकले थे कि नज़र अचानक घर की ओर पड़ी।

देखा — गेट के बाहर पापा और मेरा स्कूल का दोस्त खड़े थे।

पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए — मैं ठिठक गया।

दिल में सवाल उठा — गर्मी की छुट्टियों में यह यहाँ क्या कर रहा होगा?

सोचा, शायद किसी कॉमिक्स के बहाने आया हो... या कोई ख़बर लेकर।

मैं जैसे ही पास पहुँचा, उसने बिना किसी भूमिका के सीधा बाउंसर फेंक दिया —

“और विनोद! कैसा है? मालूम है न — कल रिजल्ट है।

तू कब निकलेगा? सुबह साढ़े सात बजे स्कूल पहुँचना है। यही बात मैं अंकल को भी बता रहा था।”

हाय… “रिज़ल्ट”! यह शब्द कानों में पड़ते ही जैसे मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मैंने अपने भाई की ओर देखा — उसके कानों तक भी यह शब्द पहुँच चुका था, और उसी पल उसके पैरों के नीचे की ज़मीन भी खिसक गई। एक ही पल में हमारी सारी खुशियाँ ऐसे अन्तर्धान हो गईं — जैसे दूरदर्शन के किसी पौराणिक धारावाहिक में ब्रह्माजी के “तथास्तु” कहते ही उनका अन्तर्ध्यान होना।

असल में बात फेल होने की नहीं थी — वह तो दूर की कौड़ी थी। फ़र्स्ट डिवीज़न पक्की थी। लेकिन विद्यार्थी–जीवन में “रिज़ल्ट” शब्द ही ऐसा है, जिसके सुनते ही शरीर में बिजली दौड़ जाती है। छह से छत्तीस वर्ष तक — हर आयु पर वही बिजली समान रूप से कौंधती है।

पापा के सामने मैंने मन को सँभालते हुए बनावटी मुस्कान में कहा —

“अच्छा, हाँ–हाँ, मालूम है… ठीक है… मैं और भाई जाएँगे सुबह सवा सात बजे।”

तभी पापा ने ठंडी और गंभीर आवाज़ में कहा —

“नहीं, मैं चलूँगा कल तुम्हारे साथ रिज़ल्ट लेने।”

यह ब्रह्मवाक्य कहकर वे घर के भीतर चले गए।

बस, यह सुनते ही मेरे और भाई के चेहरे का रंग उड़ गया। हम दोनों का चेहरा और शरीर ऐसा हो गया, जैसे श्रीकृष्ण जन्म की आकाशवाणी सुनकर कंस का हुआ होगा।

अभी कुछ देर पहले मन हल्के बादल–सा मस्ती में आसमान में तैर रहा था, मगर अब ऐसा लगने लगा मानो किसी ने उस पर बड़ी–सी चट्टान रख दी हो। मन का हर्ष, उस असफल रॉकेट की तरह धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़ा, जिसने उड़ान भरते ही अपनी दिशा खो दी हो।

माथे पर अब गर्मी का नहीं, डर का पसीना बहने लगा था। डर न तो फेल होने का था, न ही पापा की मार का — पापा ने कभी भी हम भाई–बहनों पर हाथ नहीं उठाया था। न ही पढ़ाई को लेकर ज़्यादा टोका–टाकी की थी और न ही वे सख़्त स्वभाव के थे। लेकिन जब उनका गुस्सा आता, तो बिजली की तरह गिरता — क्षणिक, मगर इतना तीखा कि उस पल जीवन व्यर्थ लगता और दुखों का अंबर सिर पर टूट पड़ता। वैसे भी घरवालों को कोई उम्मीद नहीं थी कि हम दोनों में से कोई न्यूटन, आइंस्टाइन या राकेश शर्मा बनेगा। मगर यह कमबख़्त रिज़ल्ट घरवालों के मन में कुछ न कुछ उम्मीद जगा ही देता था।

ख़ैर, दोस्त को अलविदा कहकर जैसे ही हम घर के गेट की ओर मुड़े, मैंने अपने भाई की तरफ़ देखा। मैं छठी में था और वह बस एक क्लास आगे — सातवीं में। पर हालत उसकी भी मेरी जैसी ही थी। भय नाम का यह जीव बड़ा बेरहम होता है — न उम्र देखता है, न मासूमियत, न समय।

थोड़ी देर पहले जो भूख उछल–कूद मचा रही थी, अब शवासन में जा चुकी थी। शाम का मैच जीतना, चौके–छक्कों का रोमांच — सब मानो पिछले जन्म की कोई धुंधली कथा लगने लगे।

हम दोनों भाइयों के चेहरों पर अब बस एक ही नक़्श था — डर, चिंता और घबराहट का। और मन? उस पर रखा भारी पत्थर और भी दबने लगा था।

दो–तीन दिन से तो मन में बड़ा सपना सजाया था — सोचा था, पापा को मना लूँगा कि अभी–अभी पिछले महीने रिलीज़ हुई कयामत से कयामत तक और साथ ही एक मिथुन दा की धाँसू फ़िल्म की वीसीआर कैसेट ले आएँगे। बढ़िया गद्दे पर लेटकर मूवी देखी जाएगी रात भर — वैसे भी छुट्टियों में जल्दी उठना किसे रहता है!

लेकिन हे प्रभु! कैसी विपदा आन पड़ी। रिज़ल्ट तो रिज़ल्ट, ऊपर से पापा भी साथ चलेंगे! यह तो वही बात हो गई — मूसल पर काँटे। आमिर ख़ान और जूही चावला का चाव अब गायब हो चुका था; मूवी तो बहुत दूर की बात, साँस लेना भी दूभर लग रहा था।

घर के भीतर गए तो देखा, दूरदर्शन पर किसान भाइयों के लिए “सोयाबीन की फसल में कीट नियंत्रण कैसे करें” का कार्यक्रम चल रहा था। ज़िंदगी में अभी तक हमने धनिया तक नहीं उगाया था, पर टीवी देखने के चाव में वह भी पूरा देख लेते थे। मगर अब न उसमें मन था, न रुचि।

हाथ–मुँह धोकर खाने बैठे तो मनपसंद भिंडी की सब्ज़ी भी टिंडे का स्वाद देने लगी। दाल, रोटी और फ़्रीगंज से लाए नए लौंग के सेव — सभी स्वाद खो बैठे।

जैसे–तैसे खाना निपटाया ही था कि मम्मी की आवाज़ बिजली–सी कौंधी —

“यूनिफ़ॉर्म निकाल लो! बेल्ट निकाल लो! प्रेस कर लो!

जूते भी पॉलिश कर लेना — नहीं तो सुबह वक़्त नहीं मिलेगा!”

बेबस मन से कपड़ों की अलमारी के नीचे वालें खाने में झाँका — कपड़ों के ढेर में कहीं धुली हुई यूनिफ़ॉर्म दबी पड़ी थी।

पास ही ड्रेसिंग टेबल के दराज़ में धूल फाँकता स्कूल का बेल्ट भी मिल गया —

जैसे वह भी छुट्टियों की लंबी नींद से खिंचाई लेते हुए उठ बैठा हो।

दीदी ने हम दोनों की यूनिफ़ॉर्म प्रेस कर दी और मैं झुके सिर से चेरी ब्लॉसम लगाकर जूतों पर ब्रश फेरने लगा। काले जूतों की चमक जैसे मेरे दिल की धड़कन को और तेज़ कर रही थी — हर रगड़ के साथ घबराहट दोगुनी होती जा रही थी।

मन कहीं नहीं लग रहा था। बस एक ही तस्वीर घूम रही थी — सुबह का रिज़ल्ट और पापा का मेरे साथ खड़ा होना। घर वाले कहते थे कि “बड़े होगे तो समझ में आएगा दुनिया कैसी है।” वही दुनिया अभी आँखों के सामने ज़ोर से घूम रही थी।

याद आया कि कल ही नानाखेड़ा चौराहे से गुज़रते हुए साइकिल पर बाबा का प्रवचन लाउडस्पीकर पर सुना था —

“शरीर ही नहीं, आत्मा भी सुधारो।”

लेकिन उस वक़्त हालत यह थी कि शरीर पसीने से तर था और भीतर आत्मा ऐसे काँप रही थी जैसे पौष की ठंड में सुबह नहाया हुआ बच्चा। आत्मा को सुधारना तो दूर, सँभालना ही भारी पड़ रहा था।

पॉलिश किए जूते एक कोने में रखे और टीवी देखने लगा, मन ही मन सोच आया — “रिज़ल्ट कल है — ये खबर अभी–अभी मिली। घरवालों को तो पता था कम से कम दो–तीन दिन पहले से ही, मगर उन्होंने चुप्पी साध रखी थी। ज़रा–सा बता देते तो मन से थोड़ी तैयारी कर लेता, खुद को समझा देता कि ‘हाँ भाई, कल महाभारत हो सकती है।’”

पर नहीं! खबर लाने की जिम्मेदारी निभाई उस नालायक टेलीग्रामिया दोस्त ने, जिसने क्लास में कभी भी ढंग से बात तक नहीं की थी, लेकिन यहाँ सीधा घर पर आकर ऐलान कर दिया — मानो कोई मुंशी कोर्ट का समन पढ़ रहा हो।

अरे चलो, माना खबर देना भी ठीक था, पर नालायक को पापा के सामने उगलने की क्या ज़रूरत थी? सामने ही तो खेल रहा था मैं, वहीं आ जाता, हम बता देते घर वालों को चुपचाप और हम दोनों भाई सुबह साइकिल से स्कूल जाकर रिज़ल्ट ले आते। शाम को पापा ऑफिस से आते, चाय की प्याली हाथ में होती और उसी के साथ रिपोर्ट कार्ड भी दिखा देते। हाँ, थोड़ा बहुत सुनना पड़ता, पर मामला वहीं रफ़ा–दफ़ा हो जाता — कुछ पाँच–दस मिनट में।

पर अब तो लग रहा था जैसे सीधा मजिस्ट्रेट के सामने पेशी होने वाली है — वो भी अपनी क्लास के लड़के–लड़कियों और शिक्षकों के सामने। भले ही हम बच्चे थे, पर स्कूल में अपने नाम से जाने जाते थे। रुतबा भले ही न था, पर कुछ पहचान थी और शायद कुछ इज़्ज़त भी। अब वह इतने मेहनत से कमाया नाम सबके सामने पापा की डाँट से मिट्टी में मिटता हुआ दिख रहा था।

मन तो ऐसा हो रहा था कि हाथ में पानी लेकर उसी दोस्त को श्राप दे दूँ —

“जा, कमीने, तू फेल हो जा; भगवान करे, तेरे हिन्दी में ३३ नंबर भी न आएँ!”

घड़ी का काँटा आगे बढ़ता जा रहा था।

आशा ऐसी चीज़ है जो संकटकाल में जीवित रखती है। उसी आशा की किरण थामे मैं कल्पना करने लगा — काश, कल सुबह या आज रात पापा को ऑफिस का कोई ज़रूरी काम आ जाए!

हाँ याद आया , जब विधानसभा का अधिवेशन चलता था, तब प्रश्नकाल में विपक्षी सदस्य अक्सर किसी सड़क, पुल, नहर या भवन के निर्माण कार्य की स्थिति जानने के लिए संबंधित मंत्री से सवाल पूछते थे। ये प्रश्न मंत्रीजी को कुछ दिन पहले ही मिल जाते थे। उसके बाद मंत्रालय से कोई अधिकारी या बाबू भोपाल से ज़िले के संबंधित कार्यालय में पहुँचता, ताकि वहाँ से उस विकास कार्य का सही जवाब तैयार कराया जा सके।

ज़िले के अफसरों को तुरंत काम पर लगना पड़ता। पूरे दिन की थकान के बाद भी दफ़्तरों में अचानक चहल–पहल बढ़ जाती। कागज़, फाइलें, टाइपराइटर की खटखटाहट, फोन पर आदेश, और समय की बेचैनी — सब एक साथ गूँजने लगते। जवाब रातों–रात तैयार कर भोपाल भेजना होता था।

कई बार पापा शाम के सात–आठ बजे ऑफिस के लिए निकल जाते थे, जब ऑफिस का चपरासी घर आकर कहता, “साब, विधानसभा आई है।” और फिर लौटते देर रात बारह–एक बजे।

सोचा — वाह! अगर आज भी विधान सभा का काम निकल आया, तो शायद रिपोर्ट कार्ड की आफ़त टल जाए।

मैंने दीदी से पूछा —

“दीदी, अभी विधान सभा चल रही है क्या?”

दीदी ने कहा —

“हट, पागल! अभी तो ख़त्म हुई है, अब मानसून में चलेगी।”

लो! थोड़ी–सी बची आशा भी हवा हो गई। मन में खीझ उठी — क्या जनता ने इसलिए चुना था विधायकों को कि साल में केवल तीन बार ही काम करो? करो न हर सप्ताह! हम जैसे तो हर सप्ताह सोमवार से शनिवार स्कूल जाते हैं।

अब यह आशा अनंत चौदस के गणपतिजी की प्रतिमा की तरह पानी में पूरी तरह विसर्जित हो चुकी थी।

घड़ी ने आठ बजा दिए। चित्रहार शुरू हो गया।

घर के सब लोग टीवी के सामने ऐसे जमा हो गए जैसे कोई महायज्ञ हो रहा हो।

लेकिन मेरा मन? कहीं और ही अटका हुआ।

टीवी पर हीरो–हीरोइन पेड़ों के इर्द–गिर्द नाच रहे थे,

मोहम्मद अज़ीज़, शब्बीर कुमार पूरे सुर में गा रहे थे,

कभी ऋषि कपूर मुस्कुरा रहे थे, कभी मिथुन ठुमके लगा रहे थे…

बाकी सबका दिल बहल रहा था,

पर मेरा?

थोड़ी देर गाने में लगता, फिर तुरंत दिमाग़ में रिज़ल्ट की घंटी बज जाती।

हीरोइन गा रही थी —

“ग़जब का है दिन, सोचो ज़रा…”

और मैं कल के ग़जब के दिन के बारे में सोचने लगा।

एक छोटी–सी आशा अभी बाकी थी। सोचा — पापा समाचार देखने बैठेंगे और कह देंगे — “तुम ही चले जाना, मुझे कल ऑफिस से पहले किसी से मिलने जाना है।”

समाचार शुरू हुए। समाचार वाचिका ने “नमस्कार” कहा और खबरें पढ़नी शुरू कीं — प्रधानमंत्री ने आज क्या किया, विदेशी ताक़तों की साज़िश, गोर्बाचोव की यात्रा और सियोल ओलंपिक के लिए भारत दल की तैयारी… और अंत में मौसम की जानकारी।

फिर समाचार वाचिका ने “आज्ञा दीजिए” कहा और पापा आज्ञा देकर अपने कमरे की ओर चले गए।

हे दीनानाथ कृपालु! यह आशा भी गई।

दुःख बीते हुए कल की परछाइयों से जन्म लेता है,

और भय आने वाले कल की अनिश्चितताओं से।

जो बीत चुका, वह अब केवल स्मृति है;

और जो आने वाला है, वह केवल कल्पना।

पर स्मृति और कल्पना — दोनों मिलकर मन के वर्तमान को बाँध लेते हैं।

जितनी चिंता इनको लेकर भीतर पलती है,

उतना ही दुःख और भय मन के आकाश पर फैलने लगते हैं।

वही चिंता मेरे मन को घेर चुकी थी। अब मन पर पत्थर नहीं, बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे इंद्र से अपने पंखों को बचाकर मैना‍क पर्वत उड़कर मेरे मन पर बैठ चुका हो।

घड़ी का काँटा अब साढ़े नौ पर था। नौ बजे का प्राइम–टाइम धारावाहिक भी यूँ ही निकल गया।

मैंने अपने भाई की ओर देखा। वह तो बड़े आराम से तकिये पर सिर टिकाए, चादर ओढ़े, नींद की तैयारी में था। पिछले दो घंटे से मैं हज़ारों विचारों में उलझा पड़ा था, पर उसके चेहरे पर निर्विकार शांति थी — मानो कल कोई रिज़ल्ट नहीं, बल्कि पड़ोस में शादी का कार्ड बँटने वाला हो।

उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे उसने गीता के पूरे अठारह अध्याय कंठस्थ कर लिए हों — “चिंता व्यर्थ है, भैया!”

वैसे भी उसे उतनी चिंता करने की ज़रूरत कहाँ थी। जैसे ८४’ के आम चुनाव में काँग्रेस के पास सहानुभूति की लहर थी, वैसी ही घर में उसकी स्थायी सहानुभूति लहर चलती रहती थी। कारण था, बचपन में कभी सीढ़ी से गिरना, कभी पेड़ की डाल से धम्म से लुढ़कना, कभी साइकिल से गिरकर लहूलुहान होना — हर बार दया और सहानुभूति का पूरा पैकेज उसी के नाम।

उसके पास तो अर्जुन का ब्रह्मास्त्र था — घरवालों की “बेचारा तो मासूम है” गारंटी। और मैं? मैं था कर्ण, जो हमेशा निशाने पर — रथ का पहिया निकालते हुए, वो भी बिना कवच और कुंडल।

चाहे वह कुछ तोड़े या गुमा दे, दूध उड़ा दे या चाय बहा दे — घरवालों का गुस्सा? उसका एक ही निशाना — सीधे मेरी ओर। मैं बोलने में ज़रा तेज़ क्या था, अदालत का फ़ैसला तुरंत: “हाँ, इसी ने किया होगा। वो तो बेचारा सीधा है।”

ऊपर से उसकी गोरी–चिट्टी रंगत उसे और भी देवदूत साबित कर देती थी। और मैं? सुदामा, जो कृष्ण–वर्ण लेकर हमेशा शक के कटघरे में खड़ा मिलता।

एक और योजना आई — “क्यों न बुखार या पेट–दर्द का बहाना बना दूँ?”

लेकिन तुरंत ही विचार आया कि यह अस्त्र तो हमारे घर की पिछली पीढ़ी के बार–बार उपयोग से पहले ही निष्क्रिय हो चुका है।

बरसों पहले काका और बुआ अपने स्कूल के ज़माने में यही बहाने गढ़ चुके थे। कभी “आज पेट में दर्द है”, कभी “सर भारी लग रहा है” — शुरू–शुरू में यह अस्त्र सुदर्शन–चक्र जैसा चला, पर बार–बार उपयोग से यह अस्त्र अब पटाखे का फुस्सी बम हो चुका था। पापा ने सबके झूठ पकड़ लिए थे। उसके बाद से घर में यह बहाना हमेशा के लिए “प्रतिबंधित शस्त्र” घोषित हो गया।

अब हाल यह था कि अगर कोई सचमुच बीमार भी हो जाए, तो भी घर वाले पहले यही कहते —

“अरे, स्कूल नहीं जाना क्या आज? या रिज़ल्ट तो नहीं आ रहा?”

घड़ी का काँटा अब दस बजाने लगा।

मनुष्य के पास जब सारे मार्ग बंद हो जाते हैं, तो अंतिम कपाट भगवान की शरण का ही खुला रहता है। सो मैंने भी वही कपाट खोल लिया।

सोते–सोते भगवान से भाव–ताव करने लगा —

“हे प्रभु, अगर कल का दिन और रिज़ल्ट अच्छे से निकल गया तो ग्यारह लड्डू चढ़ाऊँगा… वो भी फ़्रीगंज से लाकर, ताज़ा–ताज़ा मावे के।”

उस समय यह सोचना भी ज़रूरी नहीं लगा कि लड्डुओं के पैसे कहाँ से आएँगे। बस मन में एक ही विचार था — जान बच जाए, बाकी इंतज़ाम बाद में देख लेंगे।

सुबह उठ गया। चाय फीकी लगी।

नहाने के बाद घर के मंदिर में दो अगरबत्तियाँ लगाईं,

और जितने मंत्र याद थे, वे सब पढ़ डाले —

“अतुलित बलधामं…”, “कौन सो संकट मोर…”, “नमामि शमीशान…।”

मंत्र ऐसी आवाज़ में पढ़े गए, मानो यह सुनिश्चित करना हो

कि उनकी ध्वनि सीधे स्वर्ग तक पहुँच जाए।

हम दोनों भाई बालों में तेल लगाकर, कंघी करके, स्कूल की यूनिफ़ॉर्म और मोज़े पहनकर, चमकदार काले जूते डाल अच्छे बच्चों की तरह सोफ़े पर बैठ गए।

पापा ने अपना सफ़ेद सफ़ारी सूट पहना और चश्मा लगाया, और कहा — “चलो।” उन्होंने स्कूटर किक मारी — ढूं–ढूं–ढूं! और हम दोनों भाई, यूनिफ़ॉर्म में, बगल में खड़े, तुरंत स्कूटर की पिछली सीट पर बैठ गए।

दर्शनशास्त्र का एक सबक उसी पल समझ में आ गया — भीतर बैठा डर सबसे पहले मनुष्य के बोलने की शक्ति को कुंद कर देता है। अब स्पष्ट था — यह विपदा किसी भी तरह टलने वाली नहीं।

 रास्ते में जितने भी मज़ार, मंदिर, गुरुद्वारे दिखे, स्कूटर पर बैठे–बैठे हाथ जोड़ लिए। मन ही मन प्रार्थना यही —

“हे प्रभु, कोई चमत्कार कर दो, आज रिपोर्ट कार्ड न मिले।”

लेकिन चमत्कार कहाँ होते हैं? उस दिन तो ऐसा लग रहा था मानो भगवान भी गर्मी की छुट्टियों पर गए हुए हों।

स्कूल आ गया। कहते हैं, भय का अंतिम चरण साहस होता है। अब स्कूटर में बैठे–बैठे, स्कूल के अपने साथियों को देखकर भय धीरे–धीरे छँटने लगा।

कोई दोस्त दूर से हाथ हिलाकर मुस्करा रहा था, कोई मैदान में भाग रहा था।

डर जैसे धूप में जमी हुई बर्फ़ हो — धीरे–धीरे पिघलने लगा। दोस्तों की हँसी सुनाई दी तो लगा, शायद आज का दिन उतना बुरा नहीं होगा।

मन ने तसल्ली दी — “सबका रिज़ल्ट है, अकेले मेरा थोड़ी न है… शायद सब ठीक ही हो जाएगा।”

विपदा के भी अपने चरण होते हैं।

पहला चरण — विपदा की आहट का। जब संकट आने का समाचार मिलता है, मन सबसे ज़्यादा विचलित होता है। भय उस समय हक़ीक़त से नहीं, कल्पना से जन्म लेता है — और वही सबसे भयानक होता है।

दूसरा चरण — विपदा के आरंभ का। जब संकट सचमुच सामने आता है। तब मन पर सबसे गहरा आघात पड़ता है — भूख, नींद, चैन सब गायब हो जाते हैं। जीवन का केंद्र सिर्फ़ उस विपदा तक सिमट जाता है।

तीसरा चरण — विपदा के चलने का। इस समय तक मनुष्य थोड़ा अभ्यस्त हो चुका होता है। डर वैसा नहीं रहता जैसा पहले था। अब वह उपाय सोचता है, प्रार्थना करता है, या बस समय को गुजर जाने देता है।

चौथा और अंतिम चरण — विपदा के ढलान का। जब संकट अपने अंत की ओर बढ़ता है, तब मनुष्य भीतर से परिपक्व हो जाता है। अब डर नहीं रहता, बल्कि एक शांति और सीख पीछे छोड़ जाता है।

शायद इसी तरह हर विपदा मनुष्य को तोड़ती नहीं, बल्कि उसे नया आकार देती है।

और मेरा चरण… अभी तीसरा था।

पापा ने स्कूटर स्टैंड पर लगाया। स्कूल के गेट से अंदर जाते ही एक अजीब–सी चहल–पहल थी — मानो किसी छोटे मेले का माहौल हो। हर तरफ़ अभिभावकों की भीड़, टीचर की आवाज़ें, और बच्चों की मिली–जुली प्रतिक्रियाओं की गूँज। किसी के हाथ में रिपोर्ट कार्ड था, कोई अब भी लाइन में खड़ा था।

हर क्लास के दरवाज़े खुले थे, अंदर टीचर की मेज़ पर रिपोर्ट कार्डों के छोटे–छोटे पहाड़ लगे थे। बच्चे अपने पापा–मम्मी के साथ आगे बढ़ते, टीचर मुस्कराकर उनका नाम पुकारतीं — “रोल नंबर २७, आगे आओ।”

कार्ड मिलते ही कुछ चेहरों पर राहत आती, कुछ पर सन्नाटा छा जाता। कोई खुशी से उछल पड़ता — “माँ, देखो! थर्ड आया हूँ।” और कोई चुपचाप कार्ड को मोड़कर बैग में डाल लेता, जैसे कोई गुप्त फ़ाइल हो जिसे ज़्यादा देर खुला नहीं रखना चाहिए।

किसी की सेकंड डिवीज़न थी, कोई दसवीं रैंक पर था, तो कोई मुश्किल से बाउंड्री पार कर पाया था। लेकिन सबसे ज़्यादा मस्ती में तो बैकबेंचर थे — उनके लिए “पास” होना ही सबसे बड़ी जीत थी। माता–पिता के चेहरे पर भी वही संतोष भरी मुस्कान — “चलो, लड़का पास हो गया!”

और फिर आते थे टॉपर — जिनके चेहरे पर चमक नहीं, उल्टा हल्की चिंता की लकीरें। कोई ८५ लाया, कोई ९० — फिर भी सबकी शक्ल ऐसी जैसे कोई बड़ा नुकसान हो गया हो।

सबसे पहले पापा, भाई की क्लास में गए और मैं अपनी क्लास की ओर चल दिया।

रास्ते में कुछ दोस्त मिल गए — जैसे राम–भरत का मिलन हो गया हो। डर के बीच वो मुस्कान किसी टॉनिक से कम नहीं लगी।

थोड़ी देर बाद ही पापा, भाई को लेकर मेरी क्लास में आए।

मैंने धीरे से झुककर पूछा — “कितने प्रतिशत आए?”

भाई ने धीमे से कहा — “६९।”

ठीक ही थे। अब बारी मेरी थी।

पापा ने क्लास टीचर को नमस्कार किया।

मैडम ने भी मुस्कराकर सिर हिलाया और रजिस्टर के पन्ने पलटने लगीं।

“हाँ, विनोद…” — उन्होंने चश्मा ठीक करते हुए कहा।

रिपोर्ट कार्ड निकाला, एक नज़र उस पर डाली और बोलीं —

“विनोद के ६८.५ प्रतिशत आए हैं। अर्धवार्षिक में ७४ थे, इस बार थोड़े कम हुए हैं।

क्लास में बातें बहुत करता है, ध्यान दे तो और अच्छे नंबर आ सकते हैं।

क्यों, विनोद?”

मैं चुप खड़ा था, नज़रें ज़मीन पर।

भारतवर्ष में गुरु को भगवान से ऊपर माना गया है —

और उस परंपरा को निभाते हुए मैंने वही शाश्वत उत्तर दिया —

“जी, मैडम।”

मैडम ने मुस्कराते हुए कार्ड पापा को थमाया —

मुस्कान में उम्मीद ज़्यादा थी, भरोसा थोड़ा कम।

पापा ने कार्ड लिया, नंबरों पर एक नज़र डाली,

फिर बिना कुछ कहे मुझे थमा दिया।

उस नज़र में न डाँट थी, न दुलार —

बस एक खामोशी थी, जो शब्दों से ज़्यादा गहरी थी।

मैंने रिपोर्ट कार्ड खोला।

हिन्दी ने उम्मीद के मुताबिक़ इज़्ज़त रख ली,

लेकिन साइंस… उसने हमेशा की तरह इस बार भी साथ नहीं दिया।

गणित ने किसी तरह अपनी ईमानदारी निभा ली —

न धोखा दिया, न चौंकाया।

इंग्लिश ने अपनी आदत के मुताबिक़ औसत ही दिया —

न पास होने की खुशी, न फेल होने का डर।

पास ही खड़ा भाई कार्ड पर झाँककर मुस्कराया —

उस मुस्कान में विजेता–सा आत्मविश्वास था।

शायद उसे सुकून था कि कम से कम इस बार तो मेरे ज़्यादा आए।

पापा कुछ देर क्लास टीचर से बात करते रहे,

फिर हमें देखकर बोले — “चलो।”

अब वो सफ़र शुरू हुआ जिसका डर था।

पापा ने स्कूटर स्टार्ट किया, और साथ ही बोलना भी शुरू कर दिया —

“ये क्या है, इतने कम नंबर?”

हम दोनों चुप।

हमारे हिसाब से तो नंबर ठीक–ठाक थे।

८५-९० प्रतिशत लाने वालों से हमारी कभी पटरी नहीं बैठी।

वो हमें तुच्छ समझते,

और हमें लगता कि वो किसी और ग्रह के प्राणी हैं —

न खेलकूद, न मस्ती — बस पढ़ाई, पढ़ाई और पढ़ाई।

पापा ने गियर बदला —

और उनके शब्दों की धार भी।

“कभी किताब चाहिए, कभी बैग, कभी बॉल , कभी जूते — सब दिलवा दिए।

मगर नंबर वही ढीले।”

जैसे–जैसे स्कूटर के गियर बदलते गए,

आवाज़ में कठोरता का गियर भी बढ़ता गया।

“क्रिकेट खेलते रहना बस? टीवी पर दिन–रात मैच देखना!

वीसीआर पर फ़िल्में, कैरम–ताश में डूबे रहते हो —

पढ़ाई कब करोगे?”

अब स्कूटर की स्पीड और पापा की आवाज़ — दोनों बढ़ चुकी थीं।

हम दोनों भाई पीछे बैठे, बिना हिले–डुले,

जैसे हवा भी अब बहस से डर रही हो।

स्कूल से घर का रास्ता मुश्किल से दस–पंद्रह मिनट का था,

लेकिन उस दिन लगा, जैसे पंद्रह घंटे की यात्रा हो।

आख़िरकार ब्रेक लगे।

स्कूटर रुका, पर माहौल नहीं।

सरेंडर किए हुए सैनिकों की तरह

मैं और मेरा भाई पापा के पीछे–पीछे घर के अंदर चले गए।

पापा ने स्कूटर की चाबी सोफ़े के सामने वाली मेज़ पर रखी,

एक गहरी साँस ली — और सुनाया अपना आख़िरी फ़ैसला:

“आज से तुम दोनों का क्रिकेट और टीवी बंद।

अगले साल की पढ़ाई अभी से शुरू करो।”

फिर सोफ़े पर बैठकर दैनिक भास्कर उठाया और बोले —

“ मम्मी को चाय का बोलो।”

हम दोनों अंदर आ गए।

दीदी ने हमें देखते ही धीमी आवाज़ में पूछा —

“कितने नंबर आए? कौन–सा रैंक?”

हमने बिना कुछ बोले रिपोर्ट कार्ड आगे बढ़ा दिए।

दीदी ने दोनों कार्ड देखे, भौंहें थोड़ी ऊपर उठीं और बोलीं —

“अरे, ठीक ही तो है! इतने बुरे भी नहीं हैं।”

उन्हें शायद लगा था कि हम दोनों फेल हो गए होंगे।

पापा की सख़्त आवाज़ ने शायद माहौल ही ऐसा बना दिया था।

वैसे ऊपरवाले ने मनुष्य को एक अद्भुत शक्ति दी है —

अपने ही दिमाग़ के तर्कों से अपनी हर गलती को सही ठहराने की।

ताकि भीतर अपराधबोध न रहे,

और आत्मा को यह लगे कि सब कुछ ठीक ही किया गया।

हम दोनों ने भी दीदी की बात सुनकर उसी शक्ति का इस्तेमाल किया।

मन को समझा लिया कि नंबर बिल्कुल ठीक हैं —

गलती हमारी नहीं, उम्मीदों की थी।

घर में ऐसा सन्नाटा छा गया था,

जैसे धारा १४४ लागू हो गई हो।

मैंने किचन से चाय का कप उठाया और पापा को ड्रॉइंग–रूम में दे दिया।

पापा चाय पीते–पीते अख़बार में डूब चुके थे —

विपदा का अब चौथा चरण प्रारंभ हो चुका था।

हम दोनों भाई कमरे के कोने में बैठे थे — चेहरे उतरे हुए।

डबल बेड पर वह एक छोर पर था, मैं दूसरे पर।

स्थिति तनावपूर्ण थी, किन्तु नियंत्रण में।

टीवी खामोश था, टू–इन–वन भी थम गया था,

और पंखा — वह भी जैसे डर के मारे रुक गया हो।

घर की कोई भी आवाज़, जो माहौल को और भारी बना दे,

उसे जैसे चुप रहने का आदेश दे दिया गया था।

पापा चाय और अख़बार — दोनों खत्म कर चुके थे।

उन्होंने अख़बार मोड़कर मेज़ पर रख दिया।

चश्मा उतारकर कुछ पल चुप बैठे रहे।

फिर बाहर से हमें पुकारा।

आवाज़ अब पहले जैसी नहीं थी —

उसमें नरमी थी, थकान थी।

शायद उन्हें आभास हुआ कि बच्चों को ज़रा ज़्यादा डाँट दिया।

धीरे से बोले —

“ठीक है… कोई बात नहीं , अगले साल अच्छे से पढ़ लेना।”

उनकी आँखों में गुस्से की जगह अब स्नेह था।

पिता का मन वैसे भी बाहर से कठोर, पर भीतर से बहुत कोमल होता है।

और शायद यही उनका जीवन भी —

किसी चाह से नहीं, बस एक उद्देश्य से चलता है —

अपने बच्चों को बेहतर बनते और सुखी देखते रहना।

वो शब्द हमारे लिए किसी सावन की ठंडी फुहार जैसे थे —

जैसे सूखी ज़मीन पर पहली बारिश की बूँदें पड़ें

और मिट्टी से सोंधी खुशबू उठे।

हम दोनों भाइयों के चेहरों पर मुस्कान लौट आई।

आँखों की उदासी जैसे हवा में घुल गई,

और मन हल्का हो गया —

जैसे कोई भारी बोझ उतर गया हो।

तभी मेरे मुँह से झटपट निकल पड़ा —

“पापा, वो नई पिक्चर आई है…

हम दोनों शाम को जाकर सिंधी कॉलोनी चौराहे से उसकी कैसेट ले आएँ क्या?”

पापा ने हल्की मुस्कान दी,

और बिना कुछ कहे बस सिर हिला दिया —

हाँ में।

घर का सन्नाटा टूट चुका था।

घर फिर अपनी पुरानी रफ़्तार में लौट आया था —

जैसे बरसात थमने के बाद नदी फिर से बहने लगी हो।

किचन से बर्तनों की खनक आने लगी,

कुकर सीटी मारने लगा,

टू-इन-वन पर रेडियो के गाने शुरू हो गए,

और पंखा अब पूरी रफ़्तार पर चर्र–चर्र की आवाज़ में घूम रहा था।

हमारे बचपन की दुनिया फिर से रंगों से भर गई थी —

“मम्मी! पराठे बना दो, बहुत भूख लगी है!” —

कहते ही हम दोनों किचन की तरफ़ दौड़ पड़े।

मन हल्का होकर खुशी से दौड़ने लगा —

मानो वह मैनाक, जो अब तक मन पर बैठा था,

अपने पंख समेटे फिर से दक्षिण दिशा की ओर — समुद्र में लौट चला हो।

 

टिप्पणियाँ

  1. 👌विनोद भाई ज़ोरदार 👍

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  2. भूली बिसरी यादों के गलियारों से पुनः एक बार गुजारने के लिए शत शत आभार जोशी जी।

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  3. बहुत बढ़िया। मनोरंजन, दर्शन शास्त्र, नाटकीयता, व्यंग्य, हास्य का बढ़िया संयोजन किया है। ऐसे ही लिखते रह।

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  4. जोरदार ,,पटकथा इतनी मजबूत है कि मैने ऐसा लग रहा था जैसे मुंशी प्रेमचंद का उपन्यास पढ़ रहा हु। एक ही बात में पूरा पढ़ने के बाद ही रुका।

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  5. बहुत शानदार भैया❤️

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  6. बहुत सुन्दर, इतनी पुरानी यादों को जितनी गहराई से गढ़ा है अद्भुत है, समय जैसे आंखों के सामने तैर रहा है ।

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  7. कमिने सारी यादें मानो एक पिक्चर की तरह आंखों के सामने आ गई, तूने आज जिंदगी की किताब के सबसे सुनहरे पन्नों को वापिस खोल दिया।
    क्या दिन थे भाई काश हम वापस उन्हीं दिनों मैं चले जाए।
    अभी जिंदगी एकदम खाली लगती है ,कोई उमंग मस्ती कुछ नहीं बस कोल्हू के बैल की तरह घिस रहे हैं।
    कहा है तू अभी ?
    समय निकाल कर आजा उज्जैन।

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  8. विनोद, बहुत अच्छा लिखा है। इसमें एक ऐसी आत्मकथा का रूप दिखाई देता है जो आपबीती कम और जग बीती अधिक कह सकती है। बहुत बड़े लेखकों ने अपनी आत्मकथा को इस तरह लिखा है कि उसमें आपके समय की सचाइयाँ सामने आ जाएँ, अपने जीवन की कहानी कहते कहते। तुम्हें नियमित रूप से लिखना चाहिए। यदि जैसा मैंने सोचा है वैसी आत्मकथा लिख सको तो बहुत खूब। मैं भी ब्लाग खूब लिखता रहा हूँ। पर वहाँ पाठक बहुत कम होते हैं। यह जमाना फेसबुक और इन्स्टाग्राम का है। अच्छा लगा इस ब्लाग के अन्य लेख भी पढ़ूंगा। ब्लाग स्पाट पर मेरा ब्लाग अनवरत है। यदा कदा वहाँ लिखता हूँ।

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