संदेश

तीन आखर प्रशंसा के…

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आजकल आप किसी का हाल पूछ लीजिए—जवाब भी लगभग तय हैं: “ठीक हूँ।” “चल रहा है।” “बस कट रही है।” और जो आज भी “सब बढ़िया” कह रहा है, शायद वह इतना सब्र कर चुका है कि सब्र का फल अब न खाने लायक बचा है, न जूस बनाने लायक—और अब वह पूरी तरह “ऊपरवाले की इच्छा” वाले मोड में जा चुका है। देखिए आप, चौरासी लाख योनियों के बाद मनुष्य जीवन मिला और लोग उसे भी बस काट रहे हैं। ऊपर से सात जन्मों का हिसाब अलग—कहीं यह पहला ही निकला, तो आदरणीय, अभी छह और काटने बाकी हैं! जानते हैं, मान्यवर, आप जीवन जीने के बजाय उसे “चला” या “काट” क्यों रहे हैं? क्योंकि आपने अपनी ज़्यादातर खुशियों का लिंक सीधे बैंक अकाउंट से जोड़ रखा है।  और जब मोबाइल पर बैंक का एसएमएस आ जाए—“अमाउंट क्रेडिटेड।” बस, चेहरा ऐसा खिल उठता है, मानो जिस खुशी के लिए जीवन काट रहे थे, बैंक ने वही खाते में क्रेडिट कर दी हो। लेकिन जनाब! बताइए, यह खुशी कितनी देर टिकी? आपको याद होंगी सत्तर के दशक की वे किसान-प्रधान हिंदी फ़िल्में। हीरो कमर में गमछा बाँधे गेहूँ के लहलहाते खेत में गाना गा रहा होता था। पास के ही खेत में कसी हुई घाघरा-चोली पहने हीरोइन कभी आँखें झु...

ना लाइक का मोह, ना स्क्रॉल का भय

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ज़माना बदल गया है भाईसाहब! पहले लोग ताना मारते थे—"चेहरा देखा है आईने में?" अब लोग स्वयं ही एफबी, इंस्टा और व्हाट्सऐप पर बताते फिरते हैं—"चेहरा देखा है मेरा एआई में!" अब जब पूरा भारतवर्ष अपने-अपने मुखड़ों पर एआई का उबटन मल-मलकर रातों-रात 'यूनानी देवता' बनने में लगा हुआ था, तो भला हम कब तक इस राष्ट्रीय बहती गंगा से अछूते रहते? हमने अपना आईफ़ोन खंगाला और एक अदद फोटो निकालकर एआई के हवाले कर दी। अरे... फोटो भी कोई ऐसी-वैसी नहीं—ह्यूस्टन में हमारे घर से कुछ दूर उसी वॉटरवॉल पार्क की, जहाँ नब्बे के दशक के सुपरहिट गाने “दिलबर दिलबर” में यूनिवर्स सुंदरी सुष्मिता सेन पानी के ऊँचे झरने के सामने थिरकती दिखाई दी थीं। और हमारा साइड पोज़ भी पूरा संजय कपूर की स्टाइल वाला — बायीं कलाई पर एप्पल वॉच, कंधे पर उँगली के सहारे पीछे लटकाया हुआ काला लेविस का जैकेट। एआई ने तुरंत ही हमारी फोटो निखारकर दे दी। फोटो देखकर तो हम इतने गद्गद हुए कि क्या बताएँ! मन में आया कि इस तस्वीर की एक प्रति उन सभी रिश्तेदारों को भेजी जाए, जिन्होंने बचपन से जवानी तक हमारे साँवले रंग के सम्मान में हमें ए...

जेन- ज़ी रिसर्च बनाम जेन- एक्स रूटीन

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अभी - अभी   योगा   करके ,  योगा   मैट   को   सलीके   से   समेटकर ,  तुलसी   वाली   ब्लैक   टी   लेकर   सोफ़े   पर   बैठा   ही   था। शरीर   हल्का   था ,  मन   शांत।   सोचा — चलो ,  दो   मिनट   सुस्ताते   हुए   व्हाट्सऐप   ही   देख   लिया   जाए। तभी   स्कूल   के   ग्रुप   में   एक   फ़ॉरवर्ड   मैसेज   टपक   पड़ा — “ सावधान !   नई   रिसर्च   का   दावा : अख़बार   पर   खाना  हो  सकता   है  जानलेवा  !” यह   मैसेज   भेजा   भी   तो   उस   मित्र   ने ,  जो   कभी   क्लास   की   पिछली   बेंच   का   ‘ स्थायी   मौन   सदस्य ’   हुआ   करता   था। मौन   रहना   उसका   स्वभाव   नहीं ,  बल्कि   मजबूरी   थी ,...